मंगलवार, 22 दिसंबर 2015

मजहब

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दोस्तों ,

          यह ठीक है कि मजहब हमारी चेतना का बहुत गहरा हिस्सा
है , लेकिन इसके दुरूपयोग और किसी भी धर्म के उग्र पंथियों
को इसके नाम पर देश और जनता को बंधक बनाने की अनुमति
नही दी जा सकती , क्योंकि सवाल सिर्फ नैतिकता और वैधानिकता
का ही नही बल्कि भारतीय राज्य के भविष्य का भी है ।

समाज की रचना

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दोस्तों ,


               दोस्तों हम एक ऐसे समाज की रचना में जुटे हुए है
जहाँ साधनो की पवित्रता खत्म हो रही है और साध्य
ही सब कुछ हो गया है । और यह साध्य है येन- केन
प्रकारेण धन इकठ्ठा करना ।यदि वास्तव में किसी
भी समाज में धन शक्ति सर्बोत्तम उपलब्धि और
सर्बोत्तम योग्यता का मापदंड बन जाती है तो , फिर
भष्ट्राचार के खिलाफ उठाये गये मजबूत से मजबूत
और धारधार हथियार भी कुछ समय बाद भोथरे
पड़ते नजर आने लगते हैं ।

मनुष्य का चरित्र

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दोस्तों ,

          मनुष्य का चरित्र एक श्वेत कागज की की तरह होता है
एक बार यह कलंकित हो जाय तो इसका पूर्ववत उज्ज्वल
होना काफी कठिन है ।

आज के युवाओं

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दोस्तों ,

           आजकल बारह महीनों में बारह तरीको से प्यार को अंजाम देने वाले
युवा वर्ग को क्या होता जा रहा है पता नही ! टोका टोकी इसे बिल्कुल
नापसंद है, भले ही आर्थिक मन्दी की वजह से सिलिकन वैली  का
नशा उतर गया हो लेकिन युवाओ के दिलो दिमाग से पब और रेव का
उतरना मुश्किल है ।रात भर की मस्ती ,नशा यौवन उन्माद व गलबहियां
करते बेफिक्र जोड़े जिस सनसनी को स्वीकार कर चूके है उन्हें उससे बाहर
निकालना किसी आग से गर्मी को बाहर करने की मानिंद है ।विदेशी स्टाइल ,
व्यंजनों और रईसजादों की रईसाना रहन सहन युवाओ की सोच ही बदल
दी है ।आज के युवा डेल्ही बेली के उस शब्द कोष की तरह हो गए है अपशब्दों
से भर पड़ा है ।जहां दो सकेंड के ही दृश्य में तोड़ टूटती सासों के बीच वेश्या
संस्कृति को उघाड़ कर रख देते है ।ऐसी माहौल भारतीय संस्कृति के लिये
बेहद ही घातक है ।

कभी कांटे न दे जीवन में

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दोस्तों ,


फिजाओं में फैली हुई है मुहब्बत ,

कहा है बसन्ती पवन में ,

गुलाब का फूल न दे पाए तो कोई बात नही ,

पर कभी कांटे न दें जीवन में ।।

दोस्तों दुःख से मत घबराना

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दोस्तों ,
 
 दुःख में मत घबराना पंछी ये जग दुख का मेल है ,
 
चाहें भीड़ बहुत अंबर पर उड़ना तुम्हें अकेला है ,
 
नन्हे कोमल पंख हैं तेरे और गगन की ये दुरी ,
 
बैठ गया तो कैसे होगी मन की अभिलाषा पूरी ।

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दोस्तों ,

   
 क्या बताए क्या गम मेरे अंदर है ,
   
 कागज की सवारी और राह समन्दर है ।

वर्तमान लोकतन्त्र

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वर्तमान लोकतन्त्र



वर्तमान लोकतन्त्र में नेता और गुंडा चोली और
दामन की भांति एक दूसरे के अविभाज्य अंग
बन गये हैं ।यह निश्चित कर पाना अति दुष्कर हो
गया है कि कौन बड़ा है और कौन छोटा ।
गुंडे से बड़े है नेता , नेता से बड़ा है गुंडा
पता नही भारत की नैया को कौन खेता है
नेता बिच गुंडा है , कि गुंडा बिच नेता है
कि गुंडा बना नेता है , की नेता बना गुंडा है ।

बन गया मालीक जो चौकीदार था

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जबरन मालिक बन गए जो चौकीदार थे



जबरन बन गये मालिक जो चोकीदार है ,
कागजी था शेर अब भेड़िया खूंखार है,
हमारी गलतियों का नतीजा ये हमारी सरकार है ,
सर से पैर तक एहशांफ़रामोशी भरी है जिनके ,
और हर इक रंग भी इसकी शातिरों-मक्कार है ,
हमारे ही वोटो से पुश्ते इनकी पलती है मगर ,
हमपे ही गुर्राए ...हद दर्जे का गद्दार हैं ,
अपनी खिदमत के लिये हमने बनाया खुद इसे ,
घर का जबरन बन गया मालिक जो चोकीदार है ,
निभ सकी न इससे अब तक अपनी जिम्मेदारियां ,
चन्द दिनों में रुखसती का दिख रहा आसार है ,
सब तेरी मनमानियां सह ली मगर सुन ,
फैसला करने को जनता देश को तैयार है .
पूजना शैतान को हमारी मजबूरी नही ,
वोट ही हम लोगो की अहम तलवार है ।