बुधवार, 23 दिसंबर 2015

निर्दोष निरपराध की हत्या

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दोस्तों,


      जब कभी निर्दोष , निरपराध और निहायत ही सामान्य व्यक्तियों
को कोई छिपा हुआ बम धमाके से उड़ा देता है , जब किस बस या
रेल डब्बे में हुआ विस्फोट निरीह यात्रियों को मौत के मुहं में धकेल
देता है और जब कोई औचक गोलियों के बौछार नन्हें - नन्हे दूध मुंहे
बच्चों और कमर झुकी औरतो तक की चीत्कार भरी मौत पर विचलित
नही होता तो एकबारगी मनुष्य जाती की सारी उपलब्धियां उसके
ईजाद किये सारे धर्म दर्शन , उसका समूचा ज्ञान बिज्ञान उसकी समूची
संस्कृति , समूची मानवीय चेतना कटघरे में दिखाई देने लगती है ।वह
समूची मानवीय सभ्यता जिस पर खड़े होकर मनुष्य अपने सर्वश्रेष्ठ होने
का दावा करता है निहायत ही खोखली , भौंडी और अश्लील दिखाई देने
लगती है ।

निरीह प्राणी की बलि

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निरीह प्राणी की वली





विचार या सोच की वह धारा जो किसी भी मनुष्य को
जिस किसी भी कारण से किसी दूसरे निरीह प्राणी की 
जान लेने के लिये उकसाती है , इस उकसावे में उसे 
किसी शौर्य या किसी शुभ की पूर्ति की एहसास कराती 
है वह सिर्फ घृणित पाश्विकता और निंदनीय अमानवीयता
की ही प्रतीक हो सकती है किसी बड़े उदेश्य की नही ।
जो धर्म समूह , जो मजहब के नाम पे , जो जाती वर्ग और
जो राजनितिक कर्मी ऐसी घटनाओं में भी अपने किसी उदेश्य
की पूर्ति देखते है उन्हें आदमखोर जानवर कहना भी जानवर
का अपमान है ।

भारत के संसदीय लोकतन्त्र

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भारत के संसदीय लोकतन्त्र के इतिहास में यह
घोर व्यक्तिवादी राजनीती का दौर है । आदर्शो
स्थापनाओं , सिद्धान्तों , वैचारिक विमर्शों , तथ्यों
और तर्को तथा सामान्य व्यवहारिक नैतिकतायाओं
का जितना माखौल इस काल की राजनीति में उड़ाया
जा रहा है वैसा इससे पहले किसी भी दौर में नही हुआ।
राष्ट्रवाद , गांधीवाद , समाजवाद , सम्प्रदायिक सदभाव
समतावादी समाज , समाजिक न्याय , गरीबो का कल्याण
देश भक्ति जैसे मुहबरे जिस तरह इस काल खण्ड में अर्थच्युत
हुये है वैसे पहले कभी नही हुये ।

नंगे स्वार्थो के विरुद्ध नंगे स्वार्थ !

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नंगे स्वार्थो के नंगे विरुद्ध स्वार्थ ! कोई सिद्धान्तों
के साथ नही , कोई आदर्शो का अनुगामी नही । हर
किसी की नजर राजनीति के छप्पर को फाड़कर बरसने
वाली लूट की राशि और पद प्रभाव पर लगी है ।नीतियां
पथराई हुई जनहित योजनाएं स्थगित , सार्वजनिक दायित्व
दम तोड़ते हुये ।आखिर अब कब तक चलेगा यह सब ?

रिश्तों की पाजेब

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रिश्तों की पाजेब शर्तों के खनक की मोहताज नही होती

मैं एक नारी हूँ

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सिसकी सुनकर,
किसी ने उससे कहा ,
तुम क्यों रोती हो,
व्यर्थ में समय खोती हो ,
सहम कर बोली वह ,
अपनों की उपेक्षा की मारी हूँ ,
अपने ही घरो में बनी मै बेचारी हूँ ,
कहने को तो सबकी प्यारी हूँ ,
पर उपेक्षित , अपमानित मैं एक नारी हूँ ।

देर आए दुरुस्त आये

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देर आए
दुरुस्त आये
वाली कहावत
पुलिस बखूबी निभाती है
जुर्म पहले होता है
वह बाद में आती है ।

स्त्री की प्रतिभा

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दोस्तों,
        कोई भी पुरुष स्त्री की प्रतिभा उसके स्वप्न संघर्ष और
शक्ति को कहाँ समझ पाते है ।

देश में सियासत

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दोस्तों ,
    देश में सियासत , नौकरशाह , पुलिस और माफिया का
इतना मजबूत गठजोड़ तैयार हो चुका है कि इनकी जोड़ो
में मठ्ठा डाल पाना आज के जमाने में किसी चाणक्य के
बुते का नहीं ।सियासत के चन्द्रगुप्तों ने तो पहले ही घनानन्दो
से समझौते कर लीये हैं ।

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दोस्तों ,
       जीवन-आलेख की रेखा अजीब वक्र होती है उसकी
गति मनमानी होती है ।

सत्ता बड़े बड़े निष्ठावानो को डिगा देती है

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सत्ता बड़े बड़े निष्ठावानो को डिगा देती है 




सत्ता बड़े बड़े निष्ठावानो को डिगादेती है और भृष्ट कर देती है
वह सिद्धान्तों से भटका  देती है यही भाजपा और आम आदमी पार्टी
और उसके संघटनो पर गुजर रही है ।