शनिवार, 26 दिसंबर 2015

एक बार भारत भू पर फिर माँ दुर्गे तुम आओ

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उठ  देश कर त्राहि - त्राहि अब तो इसे बचाओ



उठ देश कर त्राहि - त्राहि अब तो इसे बचाओ ,
एक बार भारत भू पर फिर माँ दुर्गे तुम आओ ,

प्रलय काल की दुंदभी , गरल- सिंधु उफनाया ,
अनय वहि की लपटो में, सारा संसार समाया ,

हुआ राष्ट्र शापित , शापो पर अब तो नजर गड़ाओ ,
एक बार भारत भू पर फिर माँ दुर्गे तुम आओ ,

अभय दान दो पशुता से , जकड़ी नरिह नरता को ,
हिंसा की जिह्वा पर बैठी , चीख रही जनता को ,

छली जा रही है संस्कृति , जड़ता को मार भगाओ ,
एक बार भारत भू पर फिर माँ दुर्गे तुम आओ ,

छल प्रपंच के कीचड़ दे , यह भरी हुई धरती है ,
उधर वासना तृषण फण , फैलाये से चलती है ,

लूट रही भारत की जनता को इन अत्याचारियों से बचाओ ,
एक बार भारत भू पर फिर माँ दुर्गे तुम आओ ।।

जब ढोंग नाग बन कर डंसने लगे

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जब ढोंग नाग बनकर डंसने लगे


जब ढोंग नाग बनकर डंसने लगे
आदर्श नागफेनी से चुभने लगे
कृतिया मवाद सी बहने लगे
धर्म आतंक बनने लगे
तो ह्रदय के दग्ध कोने में
कौन प्रेम की सरिता बहाये --?

झूठी कल्पनाये
सारी जिंदगी हम बिस्तर बनने लगे
तो प्रेयसि और प्रियतम की सच्चाई
कहा तक होगी --?

जब घर घर विभीषण होने लगे
तो राम और लक्षमण की परिभाषा कैसी -----?
धन लगी जिंदगी में
विवाद बढ़ने लगे
रोपता फूलो को हूँ
कैक्टस उगने लगे
तो कैक्टस और नरगिस में अंतर कैसा ---?
जब से मिट गए है फर्क
उच्चता और निम्नता के
बदल गए है है सन्दर्भ आदर्श के
आ गयी है सीलन जीवन में
जहर पलने लगी है हरेक पेट में

और

कहते फिरते है हम अमृत उसे
सिलवटे पड़ने लगी है हरेक विस्तर में
दर्द के फफोले उगने लगे हरेक चेहरे में
न जाने आतंक कैसा हो
आशंका घेर रही है अभी से हमे ---?