मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

सेकुलर नेताओ द्वारा हिन्दू धर्म का अपमान करना ही धर्म की परिभाषा बन गई है

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तथाकथित सेकुलर नेताओं द्वारा हिन्दू धर्म का अपमान करना ही धर्म निरपेक्षता की पहचान बनती जा रही है ।



आजाद भारत में हिन्दू धर्म और उसके प्रतीकों को अपमानित करना धर्मनिरपेक्षता की पहचान बन जाना एक गंभीर खतरे का संकेत है ।जिस भगवा की छाया में न्याय की स्थापाना का प्रतीक महाभारत युद्ध को जीता गया , जिसकी छाया में झाँसी की रानी ने आजादी के लिये संघर्ष किया और जिस भगवा को मांगलिक संकेत माना जाता है उसे ही आज गाली की तरह प्रयुक्त करने में स्वयं सेकुलरवादी नेता अपना गौरव समझते है ।वोट के लिये तथाकथित सेकुलर राजनेताओ द्वारा हिंदुओं के धर्म और भावनाओ का अपमान करना भारत राज्य के लिये बहुत ही घातक है । ऐसे तथाकथित सेकुलर नेताओ से हमे सावधान रहना चाहिये एवं इनका भारतीय राजनीती में कोई स्थान नही होना चाहिये ।

भारतीय संस्कृति में

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भारतीय संस्कृति




भारतीय संस्कृति में जिन नैतिक मूल्यों का अधिष्ठान है उन मूल्यों की ओर समाज पीठ फेर रहा है ।सत्ता से लेकर संपदा तक सर्वत्र यही स्थिति साफ दिखाई देने लगी है कि जिसकी लाठी उसी की भैस । जिसके लिये संभव है वही व्यक्ति भोगवाद का शिकार बनता जा रहा है ।जिन अधिकांश लोगो के लिये यह संभव नही है उनकी वासनाएं उन दृश्यों को देख कर उद्दीप्त होने लगी है ।हमारे समाज जीवन की रीढ़ रहे नैतिक मूल्यों पैरो तले रौंदे जाने लगे है , भष्ट्राचार , कालाबाजार के बोलबाले के साथ परिवारिक जीवन को स्थिरता प्रदान करने वाले अनेक बन्धन शिथिल पड़ते जारहे है ।अत्यधिक मधपान से लेकर व्यभिचार तक ।नैतिक मूल्यों पर चलने वालो की दुर्गति और उन्हें ठुकराने वालो की मनमानी देखकर युवा पीढ़ी का विश्वास भी पारंपरिक मूल्यों से ढहता जा रहा है ।किन्तु खाओ पीओ और मौज करो के आलावा भी जीवन को गतिमान रखने के अनेक उदेश्य है ।

मृत्यू तो प्रकृति का नियम है।

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मृत्यू तो प्रकृति का अटूट सत्य नियम है 



मृत्यू जीव मात्र को जितनी अप्रिय है उतनी ही वह अपरिहार्य भी है ।जन्म की तरह वह भी सृष्ट्रिचक्र का नाट्यपूर्ण और भेद भरा भाग है ।बसन्त में डाल - डाल पर चुपके से झांकने वाले सिंदूरी कोपले जिस तरह आदि शक्ति की लीला है उसी तरह शिशिर के पतझड़ में झड़ कर गिरने वाले जीर्ण पिले पत्ते भी उसी की क्रीड़ा है ।इसी दृष्ट्री से हमे मृत्यू को देखना चाहिये । उदय - अस्त , ग्रीष्म - वर्षा , प्रकाश - अंधकार , दिन - रात , स्त्री - पुरुष , सुख - दुःख शरीर और आत्मा , जन्म और मृत्यू ये सभी अभिन्न जोड़ियां है । जीवन का वह द्वन्दात्मक व्यक्त रूप है इन्ही ताने - बाने से आदि शक्ति विश्व के विलास और के वस्त्र बुनती रहती है ।