शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

रहजन कभी थे आजकल रहजन होने लगे

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रहबर कभी थे आजकल रहजन होने लगे

 रहबर कभी थे आजकल रहजन होने लगे ।

 मूल्य सारे क्यों इस तरह खोने लगे ।। 

स्वार्थ की आग में जल गई इंसानियत ।

 दुश्मन की कौन पूछे दोस्त से डर लगने लगे ।। 

ज़मी पर था कभी अब आसमां को चूमता ।

 उसको इंसानियत का पाठ अब बेईमानी लगने लगे ।।

 आपने देखा अपना आज का ये हिंदुस्तान ।

 हर तरफ मुफ्लिसियों काम के केले लगे ।

 कोई मालामाल हो रहा ख्वाब गांधी का तो अब फानी लगे ।।

रोचक

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