रविवार, 3 जनवरी 2016

आओ संकल्प ले भारत माता को एक नई आज़ादी दिलाने का

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आओ संकल्प ले 



हमारी समाजिक समरसता , हमारी राष्ट्रीय एकता , अखण्डता , हमारी संस्कृति अस्मिता , हमारा इतिहास - भूगोल , हमारी शिक्षा , हमारी सम्प्रभुता तक बिखड़ं एवं बिखराव के संकट के चरम बिंदु तक जा पहुँचीं है । कदाचार रोजगार का सबसे बड़ा क्षेत्र बन गया है ।सम्पूर्ण राष्ट्र आराजकता , अपराध और आतंक के अमानवीय घटनाओं से त्रस्त है ।विधि व्यवस्था घोर अव्यवस्था की पर्याय बन गई है ।हमारी माताएं हमारी बहने , हमारी बहू बेटिया अपनी सुरक्षा के लिये कहि भी आश्वस्त नही है ।आज देश नारी की शक्ति मान कर आत्मतेज के रूप में धारण करता है उसी देश में वही नारी आज अपनी माँ के कोंख में भी सुरक्षित नही है ।अपनी बेटियो के साथ हो रहे घृणित कृत्यों से इस महान राष्ट्र की आत्मा कितनी आहत होती होगी यह कल्पना का विषय है । मन में यह प्रश्न उठता है कि सारी संभवनाये क्यों तिमिराच्छन्न है ? क्यों हमारी पूरी व्यवस्था अनर्थकारी आसुरी स्वार्थो को समर्पित है ? भूख- भय , भष्ट्राचार के माया जाल में फसा हमारा देश अधोगति झेलने को विवष क्यों है आखिर क्यों ? निति कहती है किसी राष्ट्र , किसी समाज , किसी संस्कृति का उत्थान या पतन उसके नेतृत्व पर निर्भर करता है यथा राजा तथा प्रजा ।आज हमारा देश सब तरह से असुरक्षित , अव्यवस्थित , अशांत और अभाव ग्रस्त है तो इसका स्पष्ट आशय है की हमारा नेतृत्व नकारा है - या तो अविवेकी अक्षम है ।क्यों की नेतृत्व की सारे अवयव अंग प्रत्यंग गुट और गिरोह बना कर राष्ट्र को लूट रहे है ।कितन विदाहक बिडम्बना है की विश्व के विशालतम के नाम से बिख्यात भारतीय गणतन्त्र में नेतृत्व के साँचे और ढांचे दोनों राष्ट्र विरोधी , समाज विरोधी और संस्कृति विरोधी है ? साँचे मारक है तो ढांचे संहारक । दल या दलों का गठबंधन स्वार्थो की साठगांठ से बनते है तो उसकी सगठनिक संरचना माफियो बाहुबलियों और अपराधियों से ।सभी गठजोड़ के तार तस्करो उग्रवादि संघटनो औए जातीय सेनाओं से जुड़े है ।फुट डालो राज करो , नरसंहार करो राज करो , जातीय आरक्षण का आग लगाओ और राज करो निति नियमो और विधान संबिधान की धज्जियां उड़ाओ और राज्य करो ।जिस निरीह जनता के वोटो से राज्य सत्ता प्राप्त करो उसी का रक्त पियो ।सभी दलो ने इसी दुर्नीति को निति के रूप में अपना लिया है
 ।सबका लक्ष्य लूटना ,चूसना,और देश को तबाह करना ही है ।भष्ट्राचार और घोटाला राजनितिक उपलब्धि बन गई है ।देश की स्वतंत्रता के लिये अपना सबकुछ लुटादेने वाले राष्ट्र नायको का स्थान नग्न सुंदरियों , और अपराधियों तथा डाकुओं और लुटेरो ने ले ली है ।समझ में नही आता की हमारी प्रथिमकताये हमारी मान्यताएं हमारे आदर्शो हमारे जीवन मूल्य इतने परीवर्तित क्यों हो गए है ?
    दो टूक शब्दों में अड़सठ बर्ष के स्वतंत्र भारत की चाहे जो उपलब्धी रही हो उसके आगे चुनौतियों का पहाड़ अभी भी भयावह दैत्य की तरह खड़ा है और इन चुनौती का सामना तब तक नही किया जा सकता तब तक किसी दूसरे स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत न हो । तो आये लचारी और बेबसी की जंजीरो में जकड़ी और भरष्ट्रचारियों के पंजो से लहूलुहान भारत माता को एक नई आज़ादी दिलाने का संकल्प ले ।

सत्य की विजय

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सत्य की विजय



ईमानदार से सारे बेईमान ड़रते है और इसी डर के कारण उसे नफरत करने लगते है और उसके जान के दुश्मन तक बन जाते है ।धिरे - धिरे बहुत सारे लोग उसके दुश्मन बन जाते है और उसे लगता है की मैं कोई गुनाह किया हूँ । पर इसी विश्वास के साथ अपना काम इमामदारी के साथ करते जाता है कि एक दिन सत्य की विजय होगी । 

जिंदगी एक अभिलाषा है

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जिंदगी एक अभिलाषा है



जिंदगी एक अभिलाषा है ,
अजब इसकी परिभाषा है ,
जिंदगी क्या है मत पूछो यारो ,
सवर गई तो जन्नत ,
और बिखर गई तो तमाशा है ।

पहने फूलो का माला

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पहने फूलो की माला



पहने फूलो का माला ,
बनता जन का रखवाला ,
निर्धन का छीने निवाला ,
करता नित दिन घोटाला ,
बोले गांधी का भाषा ,
सब बढ़े यही अभिलाषा ,
यह कैसा खेल तमाशा ,
जन में तो घोर निराशा ,
निर्धन निचे है जाता ,
दो जून नही खा पाता ,
बस यही उन्हें है भाता ,
चुने देख भाग्य विधाता ,
निचे धरती ऊपर नभ् ,
पंछी गण करते कलरव ,
करते धोखा ये मिल सब ,
आगया वक्त जागो सब ।।

संकट ग्रस्त हुआ भू पर मनुजता

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संकट ग्रस्त हुआ भू पर आज मनुजता का अस्तित्व


संकट ग्रस्त हुआ भू पर आज मनुजता का अस्तित्व ।

मनुष्यता से रहित हुआ है आज व्यक्तियों का व्यक्तित्व ।

है अज्ञान अभाव अनय का फैला था कुलषित अंधियारा ।

आज तिमिर ने शक्ति सृजित कर प्रभा पुंज को ही ललकारा ।

जितना खतरा नही चीन से अथवा पाकिस्तान से

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जितना खतरा नही चीन से अथवा पाकिस्तान से


जितना खतरा नही चीन से अथवा पाकिस्तान से ,
उतना खतरा आज देश के भीतर शैतान से ,
           झगड़े की जड़ पंडे पंडित ,
           गीत वेद कुरान नही ,
           सर कटवाते पिर नमाजी ,
           शरियत और कुरान नही ,
बाट रहें रहमान राम को ,
मजहब की क्यारी -क्यारी ,
जाती पाती के बीच ,
जहर फैलाते बारी -बरी ,
              नफरत घुली हवा चल रही ,
              बंजर धरती सुनसान से ,
              वही गुजरती है गुलशन से ,
              चमन खेत खलियान से ,
जितना खतरा नही चीन से अथवा पाकिस्तान से ,
               उन लोगो ने समतावादी ,
               पोथी पत्रा वांचा ,
               जिन्हें चाहिए महल अटारी ,
               पूंजीवादी ढांचा ,
सुबह सुना भाषण मे करते ,
साम्यवाद की चरचा ,
और शाम को बाट रहे थे ,
जातिवाद की परचा ,
             भाषण लिए सामाजवाद से
             दृष्ट्री लीये धनवान से
             झोला झंडा प्रगतिवाद से ,
             जुड़े हुये भूदान से ,
जितना खतरा नही चीन से अथवा पाकिस्तान से
उतना खतरा देश के अंदर के शैतानो से
            दो राहे पर खड़ा ये मुल्क
            दाए चले या बाये
            बहरो की महफ़िल में अँधा
            राग भेद समझाये
एक ओर बैभव का नर्तन
 छम छन-छन पायल की
एक ओर पीड़ा गरीब की
 दुखियो की घायल की
जितना खतरा नही पड़ोसी की नियत से बेईमानी से
उतना खतरा राष्ट्रद्रोही हैवानो से
जितना खतरा -----
               वतन फरोस छुपे गावो में ,
               नगरो में राजधानी में ,
               घृणा घोलते गंगा में ,
               सतलज यमुना के पानी में ,
    हत्या करते निरपराध की ,
    तोड़ रहे है जेलो को ,
    और बमो से उडा रहे है ,
    देव मन्दिर और रेलों को ,
जितना खतरा नही मौत से मरघट से मसान से
उतना खतरा देश के इज्जतदार नेता और धनवानों से
जितना खतरा नही --+
    अपना सारा मुल्क किसे
    अजमाए किसको छोड़े
    कहां करे आलिंगन बोलो
    किसका गल्ला मरोड़े
    पुनः कहीं गद्दार न कोई
    मुल्क हमारा न बाटे
जितना नाता हमे काश्मीर की घाटी से मैदान से ,
उतना ही अपनत्व हमे त्रिपुरा से या आसाम से ,
जितना खतरा नही चीन से अथवा पाकिस्तान से ,
उतना खतरा देश के अंदर शैतान से ।।