बुधवार, 6 जनवरी 2016

अब शौर्य जगाना ही होगा

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जन - जन की रक्त  शिराओं मे ,

अब शौर्य जगाना ही होगा ।




जन - जन की रक्त शिराओं में ,
अब शौर्य जगाना ही होगा ,
जैसे भी हो अब भारत को बलवान बनाना ही होगा ,
भारत की बीती सदियो में ,
संघर्षो का इतिहास रहा ,
जय लक्ष्मी की अर्चना हेतू ,
होता जग में जय घोष रहा ,
इस मोहन मिटटी में उगते ,
बंशी - ध्वनि के संग शंखनाद ,
इतिहास पुराने पृष्ट खोले ,
करता युग-युग तक इसे याद ,
शक -हूंण-कुशन- यौवन आये,
गोरी गजनी कासिम आये ,
ले विश्व विजय का स्वप्न ,
सिकन्दर - सेल्युकष भी आये,
कुछ असिधारो से दले गये ,
कुछ मिटटी में मले गये ,
चँगेजो की मनचाही देखी ,
हमने नादिरशाही देखि ,
औरंगजेब की कटटरपन देखी ,
अकबर की चतुराई देखी ,
हम मिठे न अत्याचारो से ,
आंधी के हाहाकारो से ,
भारत सोने सा निखर गया ,
अविचारो के अंगारो से ,
बलिदान अनेको देकर ,
फिर यह देश जगाना ही होगा ,
जैसे भी हो भरत को बलवान बनाना ही होगा ।।
हल्दीघाटी का रण देखा ,
राणा का भीषण प्रण देखा ,
स्वतन्त्र भाव से नर देखे ,
माँ बहनो के जौहर देखे ,
संगा के अस्सी घाव देखे ,
फिर भी रण बिच निडर देखे ,
इस धरती पर मिटने का ,
वह भाव जगाना ही होगा ,
जैसे भी भारत को ,
बलवान बनाना ही होगा ।।

लूट सके तो लूट

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लूट सके तो लूट



जनता कष्ट से झेलती , महंगाई की मार ,
रोजमर्रे की खर्च से , सभी की है खस्ता हाल ,
आसमान छूने लगे , बाज़ारो के माल ,
कुर्सी की सब चाह में ,करने लगे अनुरोध ,
देश जाय चुल्हाभाड़ में , या मरे भारत के सब लोग ,
नेता मस्ती काटे , खाकर छप्पन भोग ,
राजनीती के चाल में , हुआ देश बर्बाद ,
कुर्सी के व्यपार में होता वाद विवाद ,
तेल , सब्जी महंगी हुई , रेल भाड़ा चढ़ा आकाश ,
कारपरेट के शतरंज का हुआ न पर्दाफांश ,
पांच साल के वक्त में लूट सके तो लूट ,
हार गए यदि वोट में कुर्सी जायेगी छूट ,
क्या जाने फिर कब मौका लगेगा हाथ ,
कैसा यह स्वराज्य है , यह कैसा जनतन्त्र ?
चुप सभी है साधके ऐसा फूंका मन्त्र !

असहाय गंगा

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असहाय गंगा


असहाय है लाचार है मजबूर है गंगा ,
अब हैसियत से बहुत दूर है गंगा ,
कैसी रही क्या हो गई हैरान है गंगा ,
शीशे में खुद को देख परेशान है गंगा ,
मैदान ही मैदान है , मैदान है गंगा ,
अब कुछ ही दिनों की लगता है मेहमान है गंगा ।

अलख जगाने कौन चलेगा

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तो अलख जगाने कौन चलेगा 




जब सीता कंचन की चेरी बन जाय ,
तो अग्नि परीक्षा देने कौन चलेगा ।
जब सयंम भी सुबिधा के घर ब्याह रचाये ,
तो बलिदानो को गले लगाने कौन चलेगा ।
भीतर प्रश्नो का कोलाहल ,
बाहर सन्नाटा ओढ़े ।
सड़को पर आवारा नारे ,
पर घर में आभाव के कोडे ।
उपदेशो को ढ़ोते-ढ़ोते ,
टूट गये धीरज के कन्धे ,
उंगली कौन उठाये किस पर ,
सब धीरतराष्ट्र आँख के अंधे ,
जब पांडव भी दुःशासन का हाथ बटावे ,
तो कुरुक्षेत्र का कर्ज चुकाने कौन चलेगा ?
जहां क्रान्ति सुबिधा भोगी होकर ,
बातो का ब्यपार चलाये ,
इंकलाब महलो के पीछे ,
मदिरा का महफ़िल सजाये ,
वहां मौत जिन्दा रहती है ,
जिंदगी लूट जाती है ,
और बेईमान न्याय के द्वारे ,
पशु चेतना रिरयाति है ,
जब सुभाष भी अनाचार के शीश झुकाये ,
तो आज़ादी का अलख जगाने कौन चलेगा ?
कुष्ठाओ की कल्लगाह में ,
जिना भी है खुद मर जाना ,
जलता गांव देखना भी तो ,
एक तरह है आग लगाना ,
आंगन में सपनो का शव रख ,
चौराहो पर गाने वालो ,
जान बुझ कर भी जुल्मो की ,
जय -जयकार लगाने वालो ,
जब प्रताप भी मान सिंह का मान बढ़ावे ,
तो हल्दी घाटी को दुलारने कौन चलेगा ?
चुप्पी की चादर से मन की आंधी का मौसम मत रोको ,
बर्फ जवानी के बहने दे ,
कहने दो गूंगे शब्दों को ,
समझौता के नोच मुखौटा ,
आंसू को अंगार बनाओ ,
खिड़की से झांकते रहो मत ,
आहों का तूफ़ान उठाओ ,
जब झाँसी की रानी ही मेहँदी रचावे ,
तो दानवता का दर्प रौंदने कौन चलेगा ?