शनिवार, 9 जनवरी 2016

हे मजदूर किसान

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हे मजदूर किसान !



हे मजदूर किसान ! नमस्कार !
सोने - चांदी से नही किंतु
तुमने मिटटी से किया प्यार ।
हे मजदूर किसान ! नमस्कार !
ये खेत तुम्हारी भरी - सृष्टि
तिल-तिल कर बोये प्राण बिज
बर्षा के दिन तुम गिनते हो ,
यह परिवार है , यह दूज , तीज
बादल वैसे ही चले गये ,
प्यासी धरती पायी न भीज
तुम अश्रु कणों से रहे सींच
इन खेतो की दुःख भरी खीज
बस चार अन्न के दाने ही
नैवेध तुम्हारा है उदर
हे मजदूर किसान ! नमस्कार !

अगर मैं शकाहारि हूँ

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अगर मै शकाहारि हूँ




अगर मै शाकाहारी हूँ ,
तो इसका मतलब ये
नही हुआ कि मुझे शेर
नही खायेगां ।

रस्मो रिवाज मेरे मुल्क के बड़े ही निराले है

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देश में अन्धेरा फैलाने वालो के घर उजाले है




रस्मो रिवाज मेरे मुल्क के बड़े ही निराले है ,
देश में अँधेरा फैलाने वालो के घर उजाले है ।