रविवार, 10 जनवरी 2016

आग लगाने वालो पहले सीखो घर की आग बुझाना

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आदर्शो ने सत्ता के घर आत्म समर्पण कर ही डाला


आदर्शो ने सत्ता के घर
आत्म समर्पण कर ही डाला
आग लगाने वालो पहले
सीखो घर की आग बुझाना
वरना भष्म करोगे सबको
जप कर केवल मन्त्र पुराना
अलख जगाना बात और है
बिन बजाने से क्या होगा
पर्वत के प्रहरी बनना है तो
चट्टानों पर करे बिछौना
जो नाचेंगे साथ समय के
वे तो केवल कठपुतली है
मोड़ समय को जो नकेल दे
वे समाज के बल असली है
धुँआ न छोडो अन्धकार में
सांस उठेगी दमा उठेगा
अगर हिलाना हो सिहांसन
संकल्प की पहनो माला
कहा सवारेगे चेहरे जब
दर्पण पर दागो का ताला ।
आदर्शो ने सता के घर
आत्म समर्पण कर ही डाला ।।
भारतीयता स्थापित करने
धर्म धर्म के सेनानी
आगे बढ़ कर त्याग करेगे
तब बनेगी नई कहानी
हाथ जलाकर हवन करो अब
हो जाओ प्रहरी बलिदानी
वरना बिष बनने वाला है
अपनी ही गंगा का पानी
शायद सूरज ऐसे डूबे
हमे छोड़कर अन्धकार में
हाथ हाथ ढूढ़ न पाए
बिछड़ न जाय हम खड़े द्वार में
घूंघट हलाहल को ले पहले
सिंधु तभी अमृत उगलेगा
शपथ पाँव में पहनो पथ पर
क्यों जमा है भीषण पाला
कहा सवारेगे चेहरे जब
दर्पण पर दागो का ताला
आदर्शो ने सत्ता के घर
आत्म समर्पण कर ही डाला ।।

आदर्शो ने सत्ता के घर

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आदर्शो ने सत्ता के घर आत्म समर्पण कर ही डाला 





आदर्शो ने सत्ता के घर ,
आत्म समर्पण कर ही डाला ,
कहा सवारेगे चेहरे जब ,
दर्पण पर दागो का ताला है ,
दोष नही सत्ता का इसमें ,
उसको तो शासन करना है ,
दोषी नही प्रशासन इसमें ,
उसका तो आँचल तो झीना है ,
दोष उन्ही का नित अपना ,
रूप बदलते दांव बदलते ,
दलित कौन पद दलित कौन जब ,
खून बह रहा घाव निकलते ,
कैसे हो निरपेक्ष धर्म जब ,
वोटो का षड्यंत्र चले है ,
कूटनीति के ओलो से कब ,
लोकनीति का चमन फल है ,
सत्ता का ज्वाला पीनी तो ,
मिट स्वयं फिर पि ज्वाला ,
कहा सवारेगे चेहरे जब ,
दर्पण पर दागो का टाला ।।

जन - कल्याण में निमित योजना

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जन कल्याण में निमित योजना





जन - कल्याण में निमित योजना शासन से स्वीकृत अनुदान ,
ऊपर से निचे आते ही हो जाता अंशदान ।
रिश्वत खोरी आज चरम पर ,
मूक बना शासन अनजान ।
हर विभाग में लापरवाही है ,
परेशान है मजदूर किसान ।
देश का शोषण कर घर भरते ,
शून्य हुआ शासन संज्ञान ,
लूट हो रहा है जहां है जो भी ,
करता बस अपना उत्थान ।
दीन - दीन होता ही जाता ,
पैसा वाला और धनवान ।
किसको फुर्सत है जो सोचो ,
किधर जा रहा हिंदुस्तान ।
महंगाई है आज चरम पर ,
छूती कीमत है आसमान ।
दिन प्रतिदिन बढ़ती बेकारी ,
क्या होगा इसका निदान ।
बिलख - बिलख कर रोते बचपन ,
चिथड़ो में लिपटा इंसान ,
फूठपाथों और गलियों -गलियों में ,
मांग रहे भिक्षादान ।
शिक्षा दवा हुई दुर्लभ है रोटी कपड़ा और मकान ,
रात बिताते है सड़को पर नित्य गवातें अपनी जान ।
बहू बेटी की इज्जत पर हाथ डालते है हैवान ,
बलात्कार महिलाओं से है छेड़ -छेड़ करते अपमान ।
राजनीति व्यवसाय बन गयी जन सेवा गणं दन्त समान ,
अवसरवाद का मकड़ जाल है निगल रहा है सबका ईमान ।
सत्ता शीर्ष पर बैठा है लेकर जनता से मतदान ,
नख शिख तक भष्ट्र हो गए करनी कथनी असमान ।
बड़ी बड़ी बाते करते होती है ऊँची उड़ान ,
जाती धर्म मन्दिर मस्जिद में धधकते है देश जहान ।
राष्ट्र धर्म को ताक पर रख के फूंक रहे है जन -जन के कान ,
इसलिये शायद कहते है मेरा भारत महान , शायद मेरा भारत महान ।







जो भोर में थे मित्रम् , रात्री में वो शत्रुम्

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जो भोर में थे मित्रम् , रात्रि में वो शत्रुम् ।




जो भोर थे मित्रम् , रात्री में वो शत्रुम्।
ईमान न चरित्रम् , हर कृत अति विचित्रम् ।
वाणी से देश भक्तम् , आचरण विरुद्धम ।
है रहबर नियुक्तमं , है राहजन के कृत्यम ।
सत्ता ही है बस धर्मम् , इस हेतु है बेशर्मम ।
नेता बखान करणं , जिह्वा परे है शर्मम ।।