सोमवार, 11 जनवरी 2016

पूछना है अब हमे सरकार से

Edit Posted by with No comments

पूछना है प्रश्न सरकार से







पूछना है प्रश्न सरकार से ,
कौन डरता है भष्ट्राचार से ,
चोर की यारी है थानेदार से ,
डॉक्टर चूसे लहू बीमार से ,
मंत्री जी लग रहे मक्कार से ,
संतरी भी चल रहे कार से ,
नोट नकली मिल रहें बाजार से,
बट रहे बैंक कोषागार से ,
जुड़ गया किर्केट जुआं व्यपार से ,
फर्क क्या इनको जीत या हार से ,
मिल रही है पत्नी पति के यार से ,
घर की हालत तंग है तकरार से ,
धर्म रक्षा हो रही है तलवार से ,
मिट रही है इंसानियत संसार से ,
डर है तो घर में छुपे घर के गद्दार से ,
कह रहे है खतरा सीमा पर से ,
सत्यवादी पड़े है बेकार से ,
झूट बोलो सब मिलेंगे प्यार से ,
शब्द लगते है बड़े खूंखार से ,
डर अब हमे लगता है अखबार से ,
पूछना है प्रश्न अब हमे सरकार से ,
कौन डरता है भष्ट्राचार से ।।

हर दल अपना दांव खेलता

Edit Posted by with No comments

हर दल अपना दावं खेलता




हर दल अपना दाव खेलता
हर दल लगा जुगाड़ में
हर मसले पर सिर्फ सियासत
देश की गरिमा गई भाड़ में
छुपे हुए सबके मनसूबे
कुटिल चाल से भरे है मन
इधर किसी के गले है मिलते
उधर किसी को आश्वासन
बन्दर बाट जो हो सत्ता की
हर दिल से एक है
किसी विषय पर गीला नही तब
सबके मकसद एक है ।।

नेता बनने के उपाय

Edit Posted by with No comments

नेता बनने के उपाय



चुटकी भर चुंगलि हो ,
चापलूसी पांव भर ,
दगाबाजी डेढ़ पांव ,
ऊपर से मिलाइये ,
तिन तोला भितरघात ,
कुटिल हंसी डेढ़ रति ,
मशा भर मकारी ले ,
कस के हिलाइये ,
कपट की काली मिर्च ,
बीस दाने गिनकर ,
एक किलो झूठ के
गर्म पानी में पक्काइये ,
वादों के चम्मच से ,
यह लोकतांत्रिक चाशनी ,
चाटे पांच साल ,
तब नेता बन जाइये ।।

जनता कष्ट से झेलती महंगाई की मार

Edit Posted by with No comments

जनता कष्ट झेलती महंगाई की मार से



जनता कष्ट से झेलती मंहगाई की मार ,
रोजमरे की खर्च से सभी की है खस्ता हाल ,
आसमान छूने लगे बाजारों के माल ,
देश चूल्हाभाड़ में जाय मरे भारत के सब लोग
नेता मस्ती काटे खाकर छप्पन भोग
राजनीती के चाल में हुआ देश बर्बाद
कुर्सी व्यपार में होता वाद - विवाद
पेट्रोल चीनी महंगी हुई रेल भाड़ा चढ़ा आकाश
कौरप्रेट के शतरंज का हुआ न पर्दाफाश
पाँच साल का वक्त है लूट सके तो लूट
हार गए यदि वोट में जायेगी कुर्सी छूट
क्या जाने फिर कब आएगा मौका अपने हाथ
बुरे वक्त में छोड़ दे उधोगपती भी अपना साथ
कैसा यह स्वराज्य है यह कैसा जनतन्त्र ?
चुप सभी है साधके ऐसा फेका मन्त्र !