सोमवार, 25 जनवरी 2016

लोकतंत्र की लाज बचाओ

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लोकतन्त्र की भारत रोता



लोकतंत्र का भारत रोता ,
लोकतंत्र की लाज बचाओ ।

फिर से कोई गांधी लाओ ,
लाल बहादुर और सुभाष लाओ।

नेता लूट-लूट कर बिदेशो में जमा करते ,
जब देखो तब टेक्स बढ़ातें ।

अगर संभव हो तो ,
गरीबो को हक दिलवाओ ।

सच्चाई बेहोश पड़ी है ,
सीना ताने अनीति खड़ी है ।

पुलिस नपुंसक हुई हमारी ,
हाल ह्रदय को किसे बताऊ ।

नई सदी चल रही आज फिर ,
अजब गजब वह ढ़ाती जाती ।

कुछ तो अब करतब दिखाओ ,
भारत को अब खुशहाल बनाओ ।।

हम फूल नही अंगारे है

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हम फूल नही अंगारे है 

हम फूल नही अंगारे है,

माँ की आँखों की तारे है ।

पनघट में राह बनाते है ,

दुश्मनो को मजा चखाते है ।

हम हिन्दुस्तानी रिपुओं को ,

पल भर में मार भगाते है ।

मत करो हमला भारत पर ,

वरना पागलो पछताओगे ।

हम शोला बन कर बरसेगें ,

जल कर स्वाहा हो जाओगे । ।

आओ हम गणतंत्र मनाये

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           आओ हम गणतंत्र मनाये

       
राष्ट्र हितो के लिए समर्पित ,
हो फिर से सर्वस्य हमारा ,
गौरव मंडित हो भारत हमारा ,
सत्य धर्म को मिले सहारा ।
       
               त्यागे हम सब स्वार्थ भावना ,
               परमारथ का पथ अपनाये ,
               ऐसे हम गणतंत्र मनाये ।


चरित्रवान हो नेता सारे ,
नैतिकता का अनुपालन हो ,
राष्ट्र भक्ति की प्रखर भावना ,
भरी यहां के जन -जन मन हो ।

                त्याग बलिदान जागे फिर
                बलिपथ पर हम कदम बढ बढ़ायें ,
                ऐसे हम गणतंत्र मनाये ।

भष्ट्राचार मिठे शासन का ,
शुद्ध बने आचरण हमारा ,
अनाचार से लोहा लेने ,
बढ़े भारत के युवक सारा ।

          अनुशासित हो कर्मी सारे ,
          सतकर्मो को गले लगाये ,
          ऐसे हम गणतंत्र मनाये ।

महाशक्ति यह बने हमारा ,
स्वतन्त्रता के मानावत का ,
भूमण्डल को दे सन्देश ,
मित्र बने आपस में हम सब ,
मित्र भाव का हो विस्तार ,
उग्रवाद आतंकवाद का ,
हो यहा शीघ्र निस्तार ,
बच्चे बच्चे भारत के ,
       
              शौर्यशील बलशाली कहलाये ,
              आओ हम गणतंत्र मनाये ।

समरस हो सारा समाज यह ,
मानवता का बने हितैषी ,
सभी सुखी सम्पन बने फिर ,
प्रगति करे हम भौतिक ऐसी ,
राष्ट्र अस्मिता की रक्षा हित में ,
       
                  हर्षित हो कर प्राण लुटाए ,
                 ऐसे हम गणतंत्र मनाये ।।
भारत माता कीइइइइइ
जयययययय





सम्प्रदायिकता

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सम्प्रदायिता



सम्प्रदायिकता एक जहर है ,

किन्तु कहा है ,

किसके घर है .

इसकी परिभाषा होनी है ,

कौन करेगा ?


कुर्सी रक्षक वाद और वादो के पंख .

जिनके धर्म निरपेक्षि हमाम में ,

सब तो नंगे है ,

करवाते रोज दंगे है ,

स्वयं कांच के घर में रह कर ,

चला रहे है पत्थर ,

उनके वापस आने परह ,

कहा जाएंगे बच कर ,

कितना पतन करवाएंगे ,

ये वोट के चक्कर ?