गुरुवार, 28 जनवरी 2016

हर व्यक्ति अपने आपको सफल समझता है

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हर व्यक्ति अपने आपको सफल समझता हैं

अमर शहीद खुदीराम बोस एवं प्रफुल्ल चाकी

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अमर शहीद खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी              



खुदीराम बोस मेदिनपुर के निवासी थे ।बहूवैनी गांव में उनका पैतृक घर था ।उनके पिता तैर्लोक्यनाथ बोस तहसीलदार थे ।माता का नाम- लक्ष्मीप्रिया देवी ।जन्म तिथि 3 दिसम्बर 1889 ई.। उनकी विप्लव पार्टी के नेता श्री सत्येंद्र बोस थे ।         

क्रांतिकारियों ने छोटेलाल और कलकते के ही एक प्रेसिडेंसी मैजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड को प्राण दंड देने का निर्णय लिया ।लाट बंग - भंग कार्यान्वित करने का अपराधी था ।और किंग्सफोर्ड ने अपने इजलास के सामने नारा लगाने और पुलिस से झगड़ने के कारण सुशिल सेन नामक एक युवक को पन्द्रह बेत मारने की सजा दी थी । और उसने बंग - भंग के विरोध में लिखे गए लेखो को राजद्रोहात्मक ठहराकर कई लेखको , पत्रकारो को दण्डित किया था ।              

6 दिसम्बर , 1907 को वह गवर्नर ट्रेन से जा रहा था । एक जगह जोरदार बम का धमाका हुआ । जिस डिब्बे में वह बैठा था उसे उड़ाने का उद्देश्य था संयोग से उसके पीछे वाला डिब्बा निशाना बना ।वह डिब्बा चूर चूर हो गया ।गवर्नर बाल बाल बच गया ।  बम मारने वाला का पता नही चला ।       

           खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने किंगस्फोरड को मारने का भार अपने कन्धों पर सहर्ष उठाया ।वे सुशील सेन की पिटाई को नही भूले थे ।बदला लेने के लिये उतावले थे ।       चाकी ' बाकुंडा ' के निवासी थे ।दोनों बिप्लवि शाखाएं श्री अरविन्द से प्रभावित थे ।चाकी के दल के नेता नेता थे यतीन्द्र राय ।गवर्नर बम कांड में श्री हेमचन्द्र के सहयोगी थे प्रफुल्ल चाकी । किंग्सफोर्ड कलकते से मुजफरपुर चला आया सेशन जज बनकर ।उसकी सुरक्षा के लिए दो सशस्त्र जवान हमेशा लगे रहते थे ।                 

                  प्रफुल्ल चाकी के साथ खुदीराम बोस भी मुजफरपुर पहुच गए । स्टेशन के समीप ही मोतीझील धर्मशाला में ठहर कर दोनों अवसर की तलाश करने लगे ।उनके पास जो बम थे उनको बनाने वाले थे उल्लासकर दत्त और हेमचन्द्र ।          वहां अंग्रेजो का एक क्लब था ।उसके निकट ही किंग्सफोर्ड का निवास था ।वह प्रत्येक दिन क्लब में जाता और घण्टे दो घण्टे बाद क्लब से वापस आता । खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने उसके लौटते समय बम मारने का निर्णय लिया । उसके गाडी और घोड़े की पहचान उन दोनों ने कर ली ।          लगभग बारह दिनों बाद 30 अप्रैल 1908 को अनुकूल अवसर मिला , वे दोनों तैयार हो कर क्लब के पास पहुचे ।उन दिन पहरे पर फैजुद्दीन और तहसिलदार खाँ नामक पुलिस के जवान तैनात थे ।उनकी नजर उन दोनों युवकों पर पड़ी ।उन्होंने डाट कर दोनों युवको को भगा दिया ।

दोनों सड़क के किनारे एक पेड़ के पीछे छिप कर किंग्सफोर्ड कर लौटने की प्रतीक्षा करने लगे । एक घोडा गाडी क्लब से निकली । दोनों सावधान हो गये । रात्रि के आठ बज रहे थे ।आँधियारी रात ! वह घोड़ा गाडी सामने से गुजरने लगी ।किंग्सफोर्ड की गाडी की तरह गाडी और वैसा ही घोड़ ..... पहरेदार ने जोरदार बम का धमाके सुना ।दोनों घटना स्थल की और दौड़ पड़े ।उन्होंने दोनों युवको को भागते हुए देखा ।अंधरे में उनकी आकृति देखकर पहचान गए की वे दोनों वही युवक है , जिन्हें क्लब के पास से कुछ समय पहले भगाया था ।    फिटन के टुकड़े बिखर गए ।एक गोरा वकील पी . केनेडी की पत्नी और उसकी बेटी घायल होकर तडप रही थी ।कोचवान भी घायल हो गया था । तहसीलदार खान ने थाने में सुचना पहुचाया । और बम मारने वाले की हुलिया भी लिखवाया । नगर की घेराबन्दी हो गई ।      किंग्सफोर्ड और केनेडी की फिटन एक जैसी थी ।दोनों के घोड़े के रंग एक जैसे थे । केनेडी के पुत्री कुछ देर बाद मर गई , किन्तु उनकी पत्नी दो दिनों बाद 2 मई को मर गई ।

        बम कांड के बाद दोनों रेलपथ के किनारे किनारे पूरब की और निकल गए । वे सिलौत और ढोली से गुजरते हुये पुसारोड स्टेशन पहुचे ।आगे की यात्रा अलग अलग करने का निर्णय किया गया ।एक साथ रहने से पुलिस के पकड़ में आने की सम्भावना ज्यादा थी । निकट में ही बैनी नामक बाजार था । चाकी को बगीचे में छोड़कर खुदीराम बाजार में पहुचे , और निरसु नामक एक एक दुकानदार के दूकान में  दही चुडा खाने बैठे गए ।    एक चौकीदार उसी दूकान में पहले से बैठ था उसकी दृष्टि खुदीराम पर पड़ी । घुंघराले बाल , लम्बा मूंछ सत्रह अठारह साल का बंगाली युवक ।उसे सन्देह हुआ । थाने के दरोगा ने जिन दो युवको पकड़ने को आदेश दिया था उनमे से एक का हुलिया उससे मिलता था ।वह खुदीराम की गतिबिधि पर ध्यान देने लगा ।  वहां अन्य लोग वार्तालाप कर रहे थे ।उनकी बातचीत का विषय था मुजफरबमकाण्ड .... बम से वकील केनेडी की बेटी मर गई और उसकी पत्नी भी बचने वाली नही है । कान में पड़ते ही खुदी राम अचानक चौक पड़े , वे दही चूड़ा खा रहे थे और खाते खाते उनके हाथ रुक गए । पूछ बैठे - क्या किंग्सफोर्ड नही मरा ।         

                चौकीदार का सन्देह विश्वास में बदल गया ।वह दूकान के बाहर निकल गया ।निरसु साह के दूकान के सामने ही कल्लू मारवाड़ी के कपड़े की दूकान में शिवप्रसाद सिंह और फतह सिंह नामक दो सिपाही सादे लिवास में दूकान में बैठे थे ।चौकीदार से सुचना मिलते ही वे दोनों ने खुदिराम को वे जब हाथ धो रहे थे दबोच लिया ।कुँए से पानी निकालने वाली रस्सी से हाथ बाँध कर सिपाहियो ने उन्हें थाने में पहुचाया ।उनके पास से एक भरी हु बन्दूक और एक रिवाल्वर बरामद हुआ ।उन दोनों सिपाहियो द्वारा ही उन्हें मुजफरपुर भेजवाया ।दर्शको ने आश्चर्यचकित हो कर देखा कि खुदीराम के चहरे पर उदासी की छाया नामात्र भी नही थी वे मुस्करा रहे थे ।   खुदीराम बोस के विरुद्द तीन सौ दो का धारा लगाकर मुकदमा चला । उनके तरफ से काम करने के लिए कोई भी वकील तैयार नही हो रहे थे तब स्थानीय वकील कालिदास बोस ने कमर कसी ।सरकारी वकील थे पटना के मानक साहब और बिनोद मजूमदार ।खुदीराम बोस के खिलाफ दोष साबीत नही हुआ किन्तु उन्होंने साहस पूर्वक स्वीकार किया कि हमने ही बम फेका था । उन्हें फांसी की सजा मिली । 11 अक्टूबर 1908 को फांसी का दिन निश्चित किया गया ।   खुदीराम हँसते हँसते फांसी पर लटक गए । उनके मुँह से निकले बन्दे मातरम् और उनके हाथ में थी गीता का किताब ।और इस तरह वे शहीद हो गए ।उनकी इच्छा अनुसार उनका अंतिम संस्कार कालिदास बोस द्वारा सम्पन हुआ ।फूलो से अरथी सजाई गई । अखड़ाघाट बूढी गंडक के किनारे , चिता पर उनके पार्थिव शरीर को मुख अग्नि दिया गया। अपार जनता श्मशान यात्र में सम्मलित हुए और चिता भस्म को माथे पर लगाते हुये अपनी श्रधांजलि अर्पित की । 

 उनकी बलिदान पर किसी देशभक्त ने यह छंद लिखा है :-

शहीदों के खूँ का असर देख लेना ।

 मिटायेंगे जालिम का घर देख लेना ।। 

 झुका देंगे गर्दन को हम जेरे खंजर । 

 ख़ुशी से कतायेगें सर देख लेना। । 

 जो खुदगर्ज गोली चलाएंगे हम पर । 

 तो कदमो में उनका ही सर देख लेना ।।                

           उधर पूसा के बगीचे से प्रफुल कुमार चाकी समस्तीपुर की ओर बढ़े ।दोपहर तक वे वहां पहुँच गए ।चेहरे पे थकावट के चिन्ह् थे और भूख सता रही थी ।रेलवे कर्मचारी के क्वाटर्स की ओर घूमते हुए ट्रेन की प्रतीक्षा कर रहे थे ।एक रेलवे कर्मचारी का ध्यान उनकी ओर आकर्षित हुआ , अखबारो में बम कांड के बारे में छपी थी और उसने पढ़ी थी ।चाकी से उसने पूछताछ की उन्होंने टालना चाहा ।कर्मचारी देशभक्त था ।उसने सहानुभूति प्रकट करते हुए चाकी को राजी कर लिया अपने क्वाटर्र में समय गुजारने के लिये ।       चाकी ने उस देश भक्त के यहां खाना खाने के साथ रात्रि विश्राम भी किया ।दूसरे दिन , दो मई को वे ट्रेन में सवार हुये । कलकते की रेल टिकट भी उस कर्मचारी के द्वारा प्राप्त हुआ । जिस डिब्बे में चाकी घुसे उसमे नन्दलाल बनर्जी नामक दरोगा भी यात्रा कर रहा था । सिंहभूमि के थाने में वह पदस्थापित था ।अवकाश के दिनों में वह अपने नाना शिवचन्द्र चटर्जी के यहां व्यतीत कर , सिंहभूमि वापस जा रहा था ।वह बमकांड के दिन मुजफरपुर में ही था । उसे घटना की जनकारी थी ।     चाकी पर नजर पड़ते ही वह इंस्पेक्टर चूक पड़ा । चौड़ा मुँह , सर पर छोटे छोटे बाल , कसरती बदन , नई उभरती मूंछ - बम फेकने वालो में से एक की हुलिया उसे मिलता था ।उस इंस्पेक्टर ने उसे बात करने की प्रयास किया चाकी अनसुनी कर दी ।बनर्जी का सन्देह बढ़ा ।           

अगले स्टेशन पर चाकी दूसरे डब्बे में चले गए ।बनर्जी की नजर उनका पीछा कर रहा था । उसने मुजफरपुर अधीक्षक के नाम एक तार भेजा । ट्रेन मोकामा पहुची ।वहां चाकी को गिरफ्तारी का तार मिल गई ।वह स्टेशन मास्टर के सहयोग से कुछ रेलकर्मियों के सहयोग से चाकी को पकड़ने चला ।मुझे आपको गिरफ्तार करना है .. सन्देह पर .. बनर्जी ने प्लेटफार्म पर टहलते हुये चाकी को रोक कर कहा । और उसका वाक्य अधूरा ही रहा - चाकी ने अपनी पिस्तौल से उस पर गोली चला दी ।निशाना चूक गया ।बनर्जी झुक गया उसके सर के ऊपर से गोली निकल गई । रेल कर्मचारी चाकी को पकड़ने के लिए दौड़े ।पकड़े जाने के पहले प्रफुल्ल चाकी ने गोली मारकर आत्महत्या कर ली ।शहीद होने के पश्चात भी उनके चहरे पर स्वभिमान और आक्रोश की झलक थी ।      कुछ दिनों बाद एक फिन सियालदह के किसी गली से गुजरते हुये क्रांतिकारी जी . दास गुप्ता ने गोली से उडा दिया ।बनर्जी को चाकी को पकड़ने के प्रयास के कारण प्रोन्नति हो गई थी ।              

जहाँ से खुदीराम बोस ने केनेडी की गाडी पर बम फेक था वहां उनकी मूर्ति स्मारक के रूप में अवस्थित है ।बैनी बाजार में निरसु साह क्व दूकान में जहाँ दही चुडा खाया वह भी था वहा भी उनका स्मारक बना जिसका उद्घाटन भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद के द्वारा उद्घाघाटन हुआ । अमर रहेगा नाम शहीदों , सूरज चन्द्र समान । अमर बना इतिहास , लहू का अंकित अमिट निशान ।। 

 (बिंध्याचल प्रसाद की रचना के कुछ अंश )