सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

दवा ही बन गई मर्ज क्या किया जाय

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दवा ही बन गई मर्ज क्या किया जाय 


दवा ही बन गई मर्ज क्या किया जाय , 

मसीहा हो गया है खुदगर्ज क्या किया जाय ।

 मिले हर एक को रोटी , मकान और कपड़े , 

किया है सबने यही अर्ज क्या किया जाय ।

 नही है कोई महफूज इस सियासत में ,

 रपट भी नही होती दर्ज क्या किया जाय ।

माँ का पैर दबाना भी मुहब्बत है

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अपनी माँ का पैर दबाना भी मुहब्बत है 

  


 किसी बिमारी की अयादत को .. जाना भी मुहब्बत है ।

 किसी भूखे को दो रोटी खिलाना भी मुहब्बत है ।।

 बहुत तन्हा शज़र दीखता है पर हकीकत नही है ये ।

 बनाना किसी शाख़ पर आशियाना भी मुहब्बत है ।। 

 मज़ा देती है तन्हाई जो जीने का सलीका हो ।

 कभी तन्हाई में कुछ गुनगुना भी मुहब्बत है ।।

 हो अखलाख दिल में तो , इबादत है बहुत आसाँ । 

कि अपनी माँ का पैर दबाना भी मुहब्बत है ।। 

 इस इश्क में अश्को के आगे भी बहुत कुछ है ।

 किसी के आँख से आंसू चुराना भी मुहब्बत है ।।

लिखने वाले

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लिखने वाले कमाल .. लिखते है 



लिखने वाले कमाल ....लिखते है ।
अपने दिल का उबाल.......लिखते है ।।

मेरे महबूब की ...मासूमियत है ।
दिन तो गुजर गया ...साल लिखते है ।।

सियासी हरकते है ...पागलो सी ।
जबाब मांगों ...सवाल लिखते है ।।

उनकी इबादत .. सलाम के लायक है ।
अम्ल करके ... अमाल लिखते है ।।

ये वतन को जल कर रख देंगे ।
तील भी होता है ...ताड लिखते है ।।

भूखे पेट की गजल है ये ।
 रोटी -सब्जी दाल लिखते है ।।

कटेगी सिर्फ दिलासो से जिंदगी कब तक

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कटेगी सिर्फ दिलासो से जिंदगी कब तक



कटेगी सिर्फ दिलासो से जिंदगी कब तक ,
रहेगी लब पे गरीबो के खामोशी कब तक ,
बरक पे आने को बेताब हो रहा है अब ,
रहेगा हासिये पर आम आदमी कब तक ,
न जाने कब ये बुराई का सील कलम कर दे ,
सहेगें लोग सियासत की जिंदगी कब तक ।

लिखने वाले कमाल .... लिखते है

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लिखने वाले कमाल .. लिखते है



 लिखने वाले कमाल ....लिखते है ।
 अपने दिल का उबाल.......लिखते है । ।
 मेरे महबूब की ...मासूमियत है ।
 दिन तो गुजर गया ...साल लिखते है ।।
 सियासी हरकते है ...पागलो सी ।
 जबाब मांगों ...सवाल लिखते है ।।
 उनकी इबादत .. सलाम के लायक है ।
 अम्ल करके ... अमाल लिखते है ।।
 ये वतन को जल कर रख देंगे ।
 तील भी होता है ...ताड लिखते है ।।
 भूखे पेट की गजल है ये ।
 रोटी -सब्जी दाल लिखते है ।।