शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

चरित्र गया तो सब गया

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बल गया तो कुछ गया

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बल गया तो कुछ गया , 


धन गया तो कुछ गया , 


चरित्र गया तो सब कुछ गया ।


बलवान से निर्धन डरते है ,


धनवान से निर्धन डरते है , 


चरित्रवान से सब डरते है ।

आत्मबल

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                          आत्मबल


 हमारे भाई यदि आत्मा और आत्मा के अस्तित्व पर विश्वास करते हो , तो वे इस बात को सहज ही विश्वास कर लेंगे - शासक हमारे शरीर के मालिक है , वे चाहे कैद करे , देश निर्वासन दे या फांसी दे किन्तु देशवासीयों का मत , आकांक्षाएं , अन्तःकरण और आत्माएं सर्वदा आकाश मुड़ने वाली पंक्षी की तरह आज़ाद है , तीखे तीखे बाण तक उन्हें बेध नही सकते । जिसका ईश्वर के सिवा अन्य कोई अवलम्ब नही है , वह जानता ही नही कि संसार में पराभव भी कोई चीज है ।" यदि संसार को आत्मा के अस्तित्व का विश्वास हो तो इस बात का सदा ध्यान रहना चाहिए , शारीरिक बल की अपेक्षा आत्मिक बल ही श्रेष्ठ है । आत्म बल वह है जिसे पर्वत भी हिल जाते है । हम आत्म बल से सब कुछ जीत सकते है ।आत्मा की शक्ति के आगे शरीर की शक्ति तृणवत् है ।इसलिये आत्म ज्ञान प्राप्त करना हमारा सबसे पहला और आवश्यक कर्तब्य है । चरित्र के द्वारा प्राप्त होता है आत्म ज्ञान । चरित्रवान व्यक्ति ही सत्य , अहिंसा , ब्रह्मचर्य , अपरिग्रह , निर्भयता आदि गुणों का पालन कर सकता है ।