गुरुवार, 21 जुलाई 2016

घाटी में फिर शोर मचा है शोर मचा है गद्दारो का

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घाटी में फिर शोर मचा है शोर मचा है गद्दारो का



घाटी में फिर शोर मचा है शोर मचा है गद्दारो का ,
मौसम बना हुआ है देखो आतंकी त्योहारो का ,
मौत हुई है आतंकी की लाखो चेहरे रोये है ,
हम तो केवल दाल - टमाटर के भावो में खोये है ,
आतंकी का एक जनाजा मानो कोई जलसा हो ,
लाखो लोग उमड़ पड़े है जैसे कोई फरिस्ता हो ,
सेना पर पथराव किया है अफजल के दमादो ने ,
फिर से थाने फूंक दिए है धरती के जल्लादो ने ,
सीधा मतलब साथ निभाने वाले भी आतंकी है ,
इन सब की वजह से पूरी घाटी आतंकित है ,
दूध पिलाना अब बन्द करो आस्तीन के साँपो को ,
चौराहे पे अब गोली मारो is का झंडा फहराने वालो को ,
सौ - सौ बार नमन् है सेना डटी रही है घाटी में ,
आतंकी को मिला रही है काट - काट के माटी में ,
सेना को अब आतंकों के छाती पर अब चढ़ जाने दो ,
साथ निभाने वालो पर अब गोली बरसाने दो ,
एक बार अब श्वेत बर्फ पर लहू का रंग चढ़ जाने दो ,
लाश बिछा दो अब गद्दारो की सेना को अब बढ़ जाने दो ,
एक परीक्षण नए बमो का गद्दारो पर कर डालो ,
दहशतगर्दो के सीने में तुम भी दहशत भर डालो ,
भूलो गिनती गद्दारो की लाश बिछाना शुरू करो ,
बन्देमातरम् भारत माँ की जय की तराना शुरू करो ,
देश प्रेमी की सैनिको की पूरी मन्नत कर डालो ,
नरक भेज कर गद्दारो को भूमि जन्नत कर डालो ।।

शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

sweet baby

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सोमवार, 16 मई 2016

भारत में जल की समस्या का आसान हल

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भारत में जल की समस्या का आसान हल




                   जल ही जीवन है , इसकी कमी पर बहस छिड़ा हुआ है कि कैसे जल की संरक्षण किया जाय ।
आज पुरे भारत में पानी की कमी पर बहुत ही हो हल्ला हो रहा है ।पानी की वचत के लिए बहुत सारे अनुभवी लोग न्यूज चैनलों एवं न्यूज पेपरों में एक से एक सलाह दे रहे है ।
                 पर बड़े ही दुर्भाग्य की बात है कि आज़ादी के लगभग 70 सालो के बाद भी हर साल भारत में बाढ़ से लाखो एकड़ फसल नष्ट हो जाते है , सैकड़ो लोग बाढ़ की पानी में डूब कर मर जाते है , कई गाँव तबाह हो जाता है । सरकार द्वारा प्रकृति आपदा घोषित किया जाता है ।नेताओं और अफसरों द्वारा बहुत ही भावुक भाषण दीये जाते है ।सरकार द्वारा प्राकृति आपदा के नाम पर बेहिसाब राहत राशि भेजी जाती है ।जिसका कोई हिसाब नही होता ।इस राशि को लूटने में नेताओं और अफसरों में होड़ मच जाती है ।इस तरह बाढ़ जनता के लिए अभिशाप तो नेताओं और अफसरों के लिए बरदान साबित होती है ।
                       फिर कुछ ही महीनो बाद भयंकर सुखा पड़ता है । लाखो एकड़ फसल सुख जाते है ।पीने के पानी के अभाव में सैकड़ो लोग हजारो मवेशीया मर जाते है । फिर सरकार द्वार उस इलाके को सूखाग्रस्त घोषित किया जाता है ।फिर सरकार द्वारा इस आपदा से निपटने के लिए राहत राशि की आवंटन होती है ।और फिर कुछ राशि को छोड़कर बाकी पैसे का बन्दरवाट ये नेता और अफसर आपस में कर लेते है ।
                           हमे तो लगता है की ये लोग इसी दिन का इन्तजार करते है कि भारत में कब बाढ़ आये एवं कब सुखा पड़े ।जैसे ही प्रकृति आपदा आता है इनके बयारे - न्यारे आ जाते है ।
                    इस समस्या का एक ही हल है कि भारत के नदियों को नहरो द्वारा एक दूसरे से जोड दिया जाय तो न तो बाढ़ आएगी और न ही भारत के किसी भी क्षेत्र में सुखा पड़ेगा । पुरे भारत में पर्याप्त सिचाई की व्यवस्था हो जायेगी । और कुछ हद तक इन नहरो द्वारा पनबिजली से बिजली पैदा कर बिजली की समस्या से भी निजात पाया जा सकता है ।
                                              पर बड़े ही दुर्भाग्य की बात है जो पहले से नहरे थे उनमे से अधिकांश नहरे देखभाल के अभाव में ध्वस्त होते जा रहे है ।
                पर ये नेतागण भारत के प्रगति के बारे में सीन ठोक कर मेट्रो , चाँद , मंगल यान, परमाणु , डिजिटल इण्डिया आदि की बाते करते है ।पर ख़ाक प्रगति कर लिए की आजादी के 70 सालो के बाद भी भारत की आधी आबादी बिजली की मुंह तक नही देखा है ।आज भी 70% किसान मॉनसून पर निर्भर है ।
                        हर साल बाढ़ आती है और हर साल सुखा पड़ता है अगर बाढ़ कि पानी को स्टोर कर लिया जाय तो सुखा से आसानी से निपट लिया जाएगा ।पर पता नही कब इन्हें सदबुद्दि आयेगी ।

रविवार, 8 मई 2016

पोजेटिव सोचे

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                                                 पोजेटिव सोचे



अगर आप अपने दिमाग में कोई चीज देख सके तो वह आपके हाथ में आ जायेगी ।
                   अगर आप सोच ले की आप क्या चाहते और ।उसे अपना प्रबल विचार बनाले , तो वह चीज आपके जीवन में प्रकट हो जायेगी ।
     
                   " बॉब प्रॉक्टर "

रहस्य

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                                                      रहस्य

आपके जीवन में जो भी चीजे आ रही है उन्हें आप अपने जीवन में आकर्षित कर रहे है । और वे उन तस्वीरों के द्वारा आपकी और आकर्षित हो रही है जो आपके मस्तिष्क में है ।यानी जो आप सोच रहे है , आपके मस्तिष्क में जो चल रहा है उसे आप अपनी और आकर्षित कर रहे है ।आपका हर विचार एक वास्तविक वस्तु - एक शक्ति है । "

शुक्रवार, 6 मई 2016

फांसी के फंदे पर लटकने से राम पसाद " विस्मिल " का देश के नवयुवको के नाम एक सन्देश -

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फांसी के फंदे पर लटकने से पहले राम प्रसाद " विस्मिल " का देश के नवयुवको के नाम एक सन्देश -




19 दिसम्बर 1927 को फांसी के फंदे पर लटकने से पहले राम प्रसाद ' विस्मिल ' रात भर गीता पढ़ते रहे । तीन बजे प्रातः नित्य - कर्मो से निपट कर , उन्होंने माता के नाम एक पत्र लिखा । पत्र में देश के नवयुवको के लिये भी सन्देश भेजा था जो इस प्रकार से था -

 " किसी के ह्रदय में जोश , उमंग और उतेजना हो तो उसे गाँवों में जाकर किसानो , श्रमजीवियों ( मजदूरो ) की दशा देखनी चाहिए और उसे सुधारने का प्रयत्न करनी चाहिए ।जन समूहों को शिक्षित करना और दलितोद्वार परमावश्यक है ।..... घृणा , उपेक्षा उचित नही । करुणा - प्रेम सहित व्यवहार हितकर है ।" 

   
          अब सवाल यह उठता है की आज़ादी के लगभग 70 सालो के बाद भी गावो में जाकर देखने पर पता चलता है की आज भी गावों में विकास मिलो दूर है । न बिजली , न स्वास्थ्य , न शिक्षा , न सफाई , न सड़क और न सुरक्षा। महज कुछ महानगरो को विकसित कर देने भर से सम्पूर्ण भारत विकसित नही हो सकता । जब तक भारत के प्रत्येक गाँवों को इन बुनियादी सुबिधा मुहैया न करा दिया जाय तब तक भारत का विकास नही हो सकता ।हम आज भी जात - पात से ऊपर उठ कर नही सोच पाते है ।इसके लिए हमे जात - पात के बन्धन को तोड़ कर आगे बढ़ना ही होगा । तब जाकर राम प्रसाद " विस्मिल " का सपना पूरा होगा ।

शनिवार, 23 अप्रैल 2016

अमर शहीद श्री अशफाकउल्ला ख़ाँ ' हसरत ' का मौत से पहले देशवासियों के नाम सन्देस

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अमर शहीद श्री अशफाकउल्ला खाँ वारसी ' हसरत ' का मौत से पहले देश वासियों के नाम एक सन्देश 


            अमर शहीद श्री अशफाकउल्ला खाँ वारसी ' हसरत ' हमेशा के लिए कब्र में दफना दिये गये । पर मौत से पहले देशवासियों के नाम एक सन्देश छोड़ गये थे जो इस प्रकार से है - ' प्यारे भारतवासी भाईयों ! आप कोई हो , चाहे जिस धर्म सम्प्रदाय के अनुयायी हो , आप देश - हित के काम में एक होकर योग दीजिये । आप ब्यर्थ में लड़ - झगड़ रहे है ।सब धर्म एक है , रास्ते चाहे भिन्न - भिन्न हो ; किन्तु लक्ष्य सबका एक ही है ।फिर झगड़ा बखेड़ा क्यों ? हम मरने वाले काकोरी के अभियुक्तों के लिए आप लोग एक हो जाइये और सब मिल कर नौकरशाही का मुकाबला कीजिये ।.... भारतवासी मुसलमानो में सबसे पहला मुसलमान मै हूँ , भारत की आज़ादी के लिए फांसी पर चढ़ते हुए , मन - ही - मन गर्व का अनुभव कर रहा हूँ । किन्तु मै विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि मै हत्यारा नही था , जैसा कि मुझे साबित किया गया है -

दिल फ़िदा करते है , क़ुर्बाने जिगर करते हैं ,

पास जो कुछ है वह , माता की नजर करते है ,

खाने वीरान कहाँ , देखिये घर करते है ,

खुश रहो अहले वतन , हम तो सफर करते है ।


                इस सन्देश के बाद हम तो यही कहेंगे -अत्याचार जब निरंकुश होकर तांडव - नर्तन करने, लगता है तब बलिवेदी पर चढ़ने के लिए तत्पर होने के अतिरिक्त अन्य उपाय ही क्या है !'
             कीड़े मकौड़े की मौत न मरकर , वीरो की तरह मरने वाले का ही नाम इतिहास मे स्वर्णाक्षरों में लिखा जाता है !'
         यह देश उसी का है , जो वतन के काम आये ........

गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

आज़ादी के दीवाने भूले विसरे क्रांतिकारी

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आज़ादी के दीवाने भूले विसरे क्रांतिकारी


आजादी के दीवाने जिन्हें हम विस्मृत कर चुके हैं जिनके बलिदानो के परिणाम स्वरूप आज हम आजादी के हवा में साँसे ले रहें है ।ऐसे अनेको क्रांतिकारियों को जिन्हें हम जानते तक नही या हम उन्हें भूलते जा रहे है उनके कुर्बानियों के फलस्वरूप आज हम आज़ादी के फल चख रहे है । उनमे से कुछ निम्न है ।

   अलीपुर षड्यन्त्र केश

कलकत्ते में क्रांतिकारियों की एक केंद्रीय गुप्त - समिति थी ।जिसके प्रमुख्य सदस्य थे सर्वश्री वारीन्द्र कुमार घोष , उपेन्द्रनाथ बंधोपाध्याय, उलास्कर दत्त , सत्येंद्र बोस , हेमचन्द्र दास और कन्हाईलाल दत्त । पेरिस से बम बनाना सीखकर आये हेमचन्द्र और उल्लासकर दत्त के घर रसायनशाला थी ।जिसमे वे लोग बम बनाया करते थे ।खुदीराम और प्रफुल चाकी को इसी समिति ने मुजफ्फरपुर भेजा था किंगफोर्ड को मारने के लिए ।*
       पुलिस को उस गुप्त समिति क पता चल गया था ।सी . आई. डी. वाले मानिकतल्ला में ही एक मकान किराए पर लेकर रहने लगे और क्रान्तिकारियो के गतिबिधियो पर नजर रखने लगे ।2 मई 1908 को मानिकतल्ले के बगीचे में वारीन्द्र घोष ने एक गुप्त बैठक बुलाई । बैठक जैसे ही शुरू हुई अचानक पुलिस दल द्वारा वे लोग घेर लिए गए अधिकांश पकड़े गये कुछ भाग गये ।
      जिस मकान में क्रांतिकारियों को सी.ई.डी. वाले आते जाते देखते थे उस मकान की तलाशी ली गई तो उस मकान में भारी मात्रा में बम , बन्दूक , पिस्तौल आदि बरामद हुई । अड़तीस व्यक्तियो पर अलीपुर षड्यन्त्र केस के नाम से मुकदमा चला ।यह बम केस का पहला मुकदमा था ।
       अरविंद घोस को भी इस केस में गिरफ्तार किया गया पर मुकदमे की अवधि तक जेल में रहने के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया । वे वारीन्द्र कुमार घोष के बड़े भाई थे ।
        खुलाना के सिविल सर्जन डा. के. डी. घोष मेडिकल के पढ़ाई के लिए लन्दन गए थे वे अपने साथ अपनी पत्नी और सन्तान को भी साथ ले गये थे ।वे लन्दन के निकट क्राउन में रहते थे ।वही पर उनके छोटे बेटे वारीन्द्र घोष का जन्म 1880 में हुआ । डा. घोष के चार पुत्र और एक पुत्री - विनय भूषण , मनमोहन घोष , अरविंद घोष , सरोजनी और वारीन्द्र घोष थे ।
       अरविंद घोष का जन्म 15 अगस्त 1872 को कलकत्ता में हुआ था ।पांच वर्ष की अवस्था में उन्हें शिक्षा प्राप्ति के लिए बड़े भाई के पास दारजलिग भेज दिए गये । दो वर्ष के बाद वे अपने बड़े भाई के साथ इंग्लैण्ड चले गए ।
         प्रारंभिक दिनों में वे एक अंग्रेज परिवार के साथ रहते हुए लैटिन की अच्छी शिक्षा प्राप्त कर ली । सेंटपॉल स्कुल में छात्रवृति सहित वे कैम्ब्रिज के किंग्स कॉलेज में दाखिल हुए ।वे वहां पढ़ाई के साथ साथ कवितायेँ लिखते थे ।
    1890 में वे सिविल सर्विस परीक्षा में सफल हुए पर घुड़सवारी में असफल होगये ।कैम्ब्रिज में वे इंडियन मजलिस के वे सेक्रेटरी भी थे ।वे अपने क्रांतिकारी भाषण के कारण अधिकांशतः अधकारी वर्ग के कोप भाजन के शिकार हो जाते थे ।
     1993 में बड़ौदा के गायकवाड़ लन्दन में थे ।उनसे परिचय प्राप्त हुआ और उन्होंने श्री अरविन्द को बड़ौदा राज्य की सेवा में नियुक्त कर दिया ।वे 13 वर्षो तक बड़ौदा राज्य की सेवा में रहे ।वहा उन्होंने गुजराती और मराठी भाषा सीखी । ततपश्चात संस्कृत और अन्य भारतीय भाषाओं की शिक्षा प्राप्त करते हुए बंगाला भी सिख ली । उसके बाद वे बड़ौदा कालेज के उप - प्रचार्य नियुक्त हुऐ ।
        1905 ई. में बंग - भंग आंदोलन प्रारंभ हुआ । श्री अरविन्द अपने को रोक न सके । बड़ौदा नरेश की नौकरी छोड़कर 1906 ई. में बंगाल नेशनल कॉलेज के प्रिंसपल बन कर वे कलकते में रहने लगे ।बड़ौदा निवास में वह गुप्त रूप से राजनितिक कार्य करते थे पर अब खुलकर मैदान में आ गए ।उनके राजनितिक जीवन के तिन दिशाये थी -
( 1 ) गुप्त संघटन बनाकर क्रांतिकारी प्रचार करना जिसका प्रधान लक्ष्य देश में सशस्त्र क्रान्ति तैयारी ।
 ( 2 ) देशव्यापी प्रचार जिसे समस्त राष्ट्र स्वतन्त्रता के आदर्श की ओर आकृष्ट हो जाये ।
 ( 3 ) जनता को संगठित कर विदेशी शासन एवं समान का वहिष्कार करना है ।
        श्री अरविन्द के दोनों बड़े भाइयों में एक विनय भूषण कूचबिहार नरेश की सेवा में और दूसरे मनमोहन घोष कलकत्ता के प्रेसिडेंसी कॉलेज में इंग्लिश के प्रोफेसर थे ।वारीन्द्र कुमार घोष अपने भाई अरविन्द के साथ बड़ौदा में रहकर इतिहास एवं राजनीति शास्त्र का अध्ययन किया था । अपने बड़े भाई के सम्पर्क में उनका देश प्रेम बढ़ा ।वे बंगाल पहुचने पर जगह जगह घूमते हुए क्रांतिकारी युवको को संघठित करने लगे ।*
      इसी सिलसिले में वारीन्द्र घोष ने पटना में आकर एक चाय की दूकान खोली । चाय के दूकान पर क्रांतिकारियों का आना जाना शुरू हो गया ।चाय की दूकान पर सी. आई. डी. वालो को भनक लग गई । खतरा मंडराते देख वारिन्द अचानक चाय की दूकान बन्द कर अपने भाई के पास बड़ौदा चले गये ।

           श्री वारिन्द्र 2 मई 1908 को मानिकतल्ले के वगीचे में क्रांतिकारियों के साथ बैठक करते हुए पकड़े गए ।उन्हें अलीपुर के जेल में बन्द कर दिया गया । उनके अन्य साथी भी इसी जेल में बन्द थे ।उन्होंने जेल से भागने की योजना बनाई । गुप्त रूप से पिस्तौल प्राप्त कर ली ।

खुदीराम के राजनितिक गुरु सत्येन्द्र बोस एवं कन्हाईलाल दत्त को फांसी 


    खुदी राम के राजनितिक गुरु सत्येंद्र बोस मेदिनपुर से अलीपुर जेल में पहुचायें गये ।बगैर लाइसेंस के बन्दूक रखने के जुर्म में उन्हें दो साल की सजा हुई थी ।मुखबिर के कहने पर उन्हें अलीपुर षड्यन्त्र केस का भी अभियुक्त बनाया गया ।उन्होंने मुखबिर नरेंद्र को मारने की प्रण कर ली । नरेंद्र गोसाई की गवाही से अनेको क्रांतिकारियों को सजा होने की अशांका थी ।सहयोग में कन्हैलाल दत्त मिल गए ।वारीन्द्र कुमार जेल से अपने साथियों के साथ भागने की योजना बनाई थी । इसके लिए पिस्तौल एव गोली भी प्राप्त कर ली थी इसकी जानकारी सत्येंद्र बोस को लग गई । वे वारीन्द्र से पिस्तौल एवं कारतूस लेने में सफल हो गए ।और पिस्तौल प्राप्त करने का उदेश्य भी वारीन्द्र से छिपा लिए ।
     और एक दिन सत्येन्द्र ने खांसी की बहाना बनाकर जेल अस्पताल में पहुंच गये ।वहां अंगरक्षको के साथ मुखबिर नरेंद्र गोसाई पहुँचा ।सत्येन्द्र ने उसे बड़े प्रेम से बातें की ।उन्होंने उसे विश्वास दिला दिया की वह भी मुखबिर बन कर जेल कष्ट से मुक्त होना चाहते है । यह जानकर नरेंद्र खुश होकर क्रांतिकारियों के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए प्रतिदिन जेल अस्पताल में सत्येन्द्र बॉस से मिलने लगा ।*
   एक दिन कन्हाईलाल दत्त पेट दर्द से बेचैन हो उठे ।जेल अधिकारियों ने उन्हें भी जेल - अस्पताल भेज दिया ।
    उसी दिन एक अंग्रेज अफसर के साथ नरेंद्र वहां पहुँचा । नरेंद्र को देखते ही सत्येन्द्र ने कुरते के भीतर से पिस्तौल निकाल कर गोली मारी पर निशाना चूक गया ।नरेंद्र भागने लगा , सत्येन्द्र ने भागते नरेंद्र पर विस्तर से उठ कर गोली मारी गोली पाँव में लगा ।फिर भी नरेंद्र भागने लगा ।सतेंद्र ने उसका पीछा करने लगे।
       नरेंद्र को भागते। देख कन्हाईलाल दत्त भी हाथ में पिस्तौल ले कर उसका पीछा करने लगे ।तब तक नरेंद्र अस्पताल गेट से बाहर निकल गया । गेटमैन ने फाटक बन्द कर दिया । परन्तु कन्हाईलाल के उग्र रूप से डर कर उसने फाटक खोल दिया और इशारे से बतला दिया की नरेंद्र उधर भागा है ।
    दोनों उधर भागे और मुखबिर नरेंद्र पर नजर पड़ते ही उस पर गोलियों की बौछार कर दी ।वह वही दम तोड़ दिया । उसको सजा देने के बाद दोनों खुश हो कर झूमने लगे । उनकी गोलियां समाप्त हो गई थी दोनों वहीं पकड़े गए ।
     दोनों पर मुकदमा चला । दोनों को फांसी की सजा हुई । 20 नवम्बर 1908 को कन्हाईलाल दत्त फांसी पर लटका दिया गया । और सत्येन्द्र बसु को उसके बाद फांसी दिया गया ।
     दत्त का शव ज्यों ही जेल से बाहर निकला ' बन्देमातरम् ' का गगन भेदी नारा गुजने लगा । अर्थी सजा कर श्मशान घाट पहुचाई गयी । अर्थी के साथ अपार जनसमूह ! कलकता में यह अभूतपूर्व दृश्य था ।उतेजित भीड़ का प्रदर्शन देख कर जेल अधिकारियों ने सतेंद्र बसु का शव नही दिया ।
       बम्बई निवासी शहीद कन्हाईलाल दत्त एक सम्पन्न परिवार के सदस्य थे । बचपन से ही उनके ह्रदय में देश प्रेम अंकुरित हो गया था । बी. ए . करने के बाद वे बम्बई से कलकता आगये ।और चन्दन नगर में एक क्रांतिकारी समिति की स्थापना की । उपेन्द्रनाथ बन्दोपध्याय के साहचर्य रहने के बाद वे वारीन्द्र घोष वाली केंद्रीय विप्लव समिति के सदस्य बन गए और 2 मई 1908 के दिन मानिकतल्ले के वगीचें से गिरफ्तार हुए ।
      सत्येन्द्र बसु मेदनीपुर के वरिष्ट क्रांतिकारी नेता थे । स्वदेशी आंदोलन के समय उनके प्रेरणा से लोगो ने उस आंदोलन में जम कर भाग लिया था ।
              मुखबिर नरेंद्र गोसाई के मर जाने से प्रमाण के अभाव में अनेक क्रांतिकारी जेल से मुक्त हो गए ।फिर भी 15 अभियुक्तों को कठोर दण्ड भुगतना पड़ा ।
             वारीन्द्र घोष एवं उल्लासकर दत्त को फांसी की सजा हुई ।हाईकोर्ट में फ़ासी के विरुद्द अपील हुई । फ़ासी की सजा को आजीवन कालापानी की सजा में बदल गई ।
       उप आरक्षी अधीक्षक शमसुल आलम जो सरकार की ओर से अभियुक्तों के विरुद्द पैरबि कर रहे थे , हाईकोर्ट में ही एक युवक ने गोली मार कर हत्या कर दी । युवक रबीन्द्रनाथ गुप्ता पिस्तौल सहित पकड़ा गया ।उसे फांसी की सजा मिली ।
        सरकारी वकील आशुतोष विश्वास को किसी क्रांतिकारी ने मौत के घाट उतार दिया ।
        प्रफुल्ल चक्रवती मानिकतल्ले के वगीचे से फरार अभियुक्त थे । वे देवघर में बम परीक्षण के दौरान बम फट जाने से शहीद हो गए ।

श्री उल्लास्कर दत्त     


आजादी के दीवाने श्री उल्लासकर दत्त शिवपुर , हाबड़ा निवासी थे । बम्बई के विक्टोरिया टेक्निकल इंस्टीच्यूट में इंजनियरिग की शिक्षा प्राप्त कर स्वदेसी आंदोलन से प्रभावित हो कर वे कलकता आकर केंद्रीय विप्लव पार्टी के सदस्य बनगए ।और अपने घर में ही बम बनाने की रसायनशाला खोली और बम बनाने लगे और बम बनाने की प्रशिशक्षण देने लगे ।
 

श्री उपेन्द्रनाथ बंदोपाध्याय


आज़ादी के दीवाने श्री उपेन्द्र बंदोपाध्याय को आजन्म द्विपरांतवास की सजा मिली ।वे स्वामी विवेकानन्द से प्रभावित हो कर उनके मायावती आश्रम में कुछ दिनों तक उनके साथ रह चुके थे । उसके बाद वे अपने घर चन्दन नगर आकर अध्यापक बन गए । और गुप्त रूप से युवा विधार्थीयों में क्रान्तिकारी विचारो का पाठ पढ़ाने लगे ।उनके इस कार्य में सहयोग कर रहे थे उनके मित्र अध्यायपक ऋषिकेश कांजीलाल । दोनों स्वतन्त्रता - प्रेमी एक ही राह के पथिक थे ।
     श्री उपेन्द्र नाथ फ्रेंच भाषा के अच्छे जानकार थे । उस समय चंदननगर फ्रांस के अधीन था । उनका जन्म 6 जून 1879 ई. को चंदननगर में हुआ था ।प्रारम्भिक शिक्षा चंदननगर में हुई ।फ्रेंच भाषा में श्रेष्ठ घोषित हुए इसके लिए उन्हें एक स्वर्ण पदक मिला ।डफ कॉलेज में भी शिक्षा प्राप्त की ।कलकत्ता में 5 सालो तक मेडिकल कॉलेज में अध्यन किया था ।
          चन्दन नगर से अध्यापन कार्य छोड़कर पटना , बनारस , बरेली घूमते हुए वे फिर स्वामी विवेकानन्द के पास पहुचं गये । वहां से सन्यासी के रूप में पंजाब का भ्रमण करते हुये चन्दन नगर आकर पुनः अध्यापन का कार्य करने लगे ।
   1906 में वे श्री अरविन्द के सम्पर्क में आये और अरविन्द के निर्देश पर अध्यापन का कार्य छोड़ कर ' बन्देमातरम् ' के सम्पादकीय विभाग में आगये । बन्देमातरम् के बन्द होने के बाद वे ' युगांतर ' के सम्पादक बने और क्रांतिकारी विचारो का खुल कर प्रचार करने लगे ।
        अलीपुर षड्यन्त्र केस के मुकदमे में उन्होंने मजिस्ट्रेट के सामने बयान दिया था -" मैंने ख्याल किया कि हिन्दुस्तान के लोग बिना धार्मिक भाव के कुछ नही करेंगे ; इसलिए मैंने साधुओं से सहायता लेनी चाहि पर वे काम न आय ।उसके बाद मैंने स्कूली छात्रो में क्रांतिकारी भावो का प्रचार करने लगा ।फिर देश के भिन्न भिन्न स्थानों में गुप्त समिति का गठन एवं शस्त्र एकत्र करने का ध्यान आया ।इसके लिए मैंने वारीन्द्र , उल्लासकर दत्त और हेमचन्द्र से भेट की और उनके साथ काम करने लगा ।हमारा मुख्य उदेश्य उच्च अधिकारियों , छोटे लाट , किंग्सफोर्ड आदि को मारने का था ।"
      श्री उपेन्द्र नाथ 1897 में विवाह के बन्धन में बधे थे ।1906 ई. में उनको एक पुत्र हुआ ।*
         ' युगांतर ' के बाद ' सन्ध्या ' के सम्पादकीय में लिखा था - " हम पूर्ण स्वतन्त्रता चाहते है । देश की उन्नति उस समय तक नही होगी जब तक फिरंगियों का अंतिम निशान यहां से मिटा न दिया जाएगा ।स्वदेशी प्रचार , विदेशी वहिष्कार उस समय तक ब्यर्थ है जब तक उनके हाथो से हम अपनी पूर्ण राष्ट्रीय स्वतन्त्रता न प्राप्त कर सके ।फिरंगियों ने मेहरबानी करके हमे जो अधिकार दिया है हम उसका तिरस्कार करते है और उनपर थूकते है । हम अपनी मुक्ति का ध्येय स्वयं प्राप्त करेंगे ।"
     " युगांतर " में एक बार लिखा था - " देशी सिपाहियो की सहायता प्राप्त करो । ये सिपाही पेट के लिए विदेशी सरकार की सेवा करते है , आखिर वे भी तो खून मांस के मनुष्य है ।वे भी सोचना - समझना जानते है , उन्हें जब देश की दशा समझायी जायेगी तो वे उचित समय पर शस्त्रो सहित बहुसंख्या में क्रांतिदल में मिल जाएंगे । विदेशी शासकों से भी शस्त्रो की सहयाता ली जा सकती है ।"
     कथित उग्र विचारों के कारण ही दोनों पत्रिका पर सरकार की वक्र दृष्टि पड़ी और दोनों की प्रकाश बन्द कर दी गई ।फ़रवरी 1920 में श्री उपेन्द्र गिरफ्तार कर लिए गए उन्हें 12 वर्षो की कालापानी की सजा सुनाई गई ।
        श्री उपेन्द्र का नाम लेखको में बड़े ही आदर से लिया जाता था ।उनकी देश सेवा को नही भुलाया जा सकता ।उनके मित्र ऋषिकेश कांजिला ने मुकदमे के समय निर्भय होकर न्यायधीश के समक्ष कहा था " मै स्कुल में पढ़ाता हूँ । चन्दन नगर में श्री उपेन्द्र ने युगांतर की कई प्रतिया मुझे पढ़ाई जिन्हें पढ़कर मुझे मातृभूमि को स्वतन्त्रता करने का ध्यान आया ।मैने स्कूल में पढ़ाते समय छात्रों को बताया की अंग्रेजो ने इस देश को धोखेबाजी से और कूटनीति से गुलाम बनाया है ।इसके लिए अंग्रेजो को सजा जरूर होनी चाहिए ।" इस बयान के बाद उन्हें भी 12 बर्षो की कठोर कारावास की सजा मिला ।
       श्री अरविन्द ने अपने भाई वारिद्र घोस के साग्रह अनुरोध पर 'युगांतर ' का प्रकाशन आरम्भ किया ।युगांतर का मुख्य उदेश्य था - अंग्रेजी शासन को पूर्णतः अस्वीकार करते हुए जनता में अंग्रेजो के विरुद्द भावना को जगाना । युगांतर की नीती अरविन्द स्वयं निश्चित करते थे । भूमिगत रहकर छापेमार युद्द करने की कला के सम्बन्ध में उन्होंने धारावाहिक लेख युगांतर में छपवाया । कुछ अंको के लेख उन्होंने स्वयं लिखा था ।*
         

श्री भूपेन्द्रनाथ दत्त


         उग्र लेखो के कारण सरकार की वक्र दृष्टि पड़ी ।युगांतर के कार्यालय पर पुलुस की छापेमारी हुई । सम्पादक का नाम पत्रिका में छपता नही था ।पुलिस के अफसर पूछा की कौन है युगांतर का सम्पादक ?
   'कहिये , क्या कहना चाहते है अफसर के सामने उपस्थित हुए श्री भूपेन्द्रनाथ दत्त । भूपेन्द्रनाथ दत्त स्वामी विवेकानन्द के भाई थे और युगांतर के उप सम्पादक ।पुलिस उन्हें युगांतर के कई प्रतियो के साथ गिरफ्तार कर के ले गई ।*
          उनपर मुकदमा चला ।अरविन्द के आदेशानुसार मुकदमे की पैरवी न करने की नीती अपनाई गई ।क्योंकि युगांतर विदेशी सरकार की सत्ता को स्वीकार नही करता ।उन्हें एक साल की कठोर कारावास दंड दिया गया ।*
      युगांतर के प्रति जनता की श्रद्धा बढ़ी और युवको में उतेजना , राजनितिक चेतना में बृद्दी हुई। *
           श्री अरविन्द विचलित नही हुए ।उन्होंने तिलक जी से अपना सम्पर्क स्थापित किया ।उस समय तिलक जी क्रान्तिकारीयों के एक मात्र नेता माने जाते थे ।और अहमदाबाद में कांग्रेस अधिवेसन में दोनों की मुलाकात हुई । तिलक जी उन्हें पंडाल से बाहर ले गए और लगभग एक घण्टे तक वार्तालाप किया ।सुधारवादी आंदोलन उन्हें पसन्द नही वे सम्पूर्ण आज़ादी के पक्षधर है ।
   

यतिन मुखर्जी


      बड़ौदा लौट कर अरविन्द ने बड़ौदा की सेना के एक युवक सैनिक यतिन मुखर्जी को अपना लेफ्टिनेंट बनाया और बंगाल में कार्य करने के लिए भेज दिया । उनका मुख्य उदेश्य था - क्रन्तिकारी विचारो का प्रचार करना और क्रांतिकारियों का सदस्य संख्या बढ़ाना । प्रत्येक शहर गावं में केंद्र स्थापित की जाय ।तरह तरह के सांस्कृतिक , बौधिक् कार्यक्रम के नाम पर नवयुवको की सभा समिति स्थापित की जाय ।और उन्हें विश्वास में ले कर क्रांतिकारी कार्य में लगाया जाय ।नवयुवको को घुड़सवारी , नाना प्रकार के खेलकूद , व्यायाम आदि की एसी शिक्षा दी जाय जो आगे चलकर सामरिक।महत्व के लिए उपयोगी हो ।*
  यतिन मुकर्जी निष्ठापूर्वक अपने कार्य में लग गए । देश भक्ति के रंग में रंगे मातृभूमि पर न्योछावर होने वाले युवको को मुँहमांगी मुराद मिल गई ।जान हथेली पर लेकर काम करने वालो की संख्या दिन दुनी वृद्धि हुई ।
   

श्री पुलिन बिहारी दास



       श्री पुलिन बिहारी दास ने 1905 में स्वदेशी आंदोलन के समय बिपिचनन्द्र पाल , वैरिस्टर पि. मित्र के साथ मिल कर अनुशीलन समीति की स्थापना की ।इस समीति में सदस्य बंगाल के बाहर के प्रान्तों के थे ।इसके अलावे भी बंगाल में कई अन्य छोटी छोटी गुप्त समितियां थी । श्री अरविन्द की इच्छा थी की साड़ी गुप्त समितियां एक हो जाए ।पर बंगाल विभाजन के आक्रोश ने क्रांतिकारी विचारो को दिया और व्यापक रूप से सर्वत्र फ़ैल गया ।*
               हिंसक और अहिंसक दोनों आंदोलनों में बंगाल आगे था ।उसकी एकता भंग और कमजोर करने के लिए लार्ड कर्जन ने बंगाल को विभाजन का निश्चय किया ।बंगालियों को जब कर्जन की नियत का पता चला तो वे आग बबूला हो गए ।अंग्रेजो ने लाखो विरोध के वावजूद बंगाल विभाजन का इंग्लैण्ड के भारत सचिव से स्वीकृति मिल गई ।16 अक्टूबर 1906 को बंगाल विभाजन लागू कर दिया गया ।चारो तरफ घोर बिरोध होने के कारण 12 दिसम्बर 1911 को दिल्ली दरबार में बंगाल को एक कर देने की घोषणा हुई और बिहार , उड़ीसा और असम अलग हो गए ।*
         अनुशीलन समीति के संस्थापक पुलिन बिहारी मणिपुर काण्ड से आग बबूला हो गए ।1857 के गदर के बाद स्पष्ट घोषणा की गई थी की अब किसी भी राजवाड़े को अंग्रेजी राज्य में नही मिलाया जाएगा । किन्तु मणिपुर की स्वतन्त्रता को छल कपट से छीन कर अंग्रेजो ने अपने राज्य में मिला लिया ।इसके पहले बड़ौदा के गायकवाड़ को अंग्रेज रेजिडेंट को मारने की साजिश रचने की झूटा आरोप लगाकर गद्दी से बे दखल कर दिया था ।पुलिन बिहारी व्यायामशाला खोलकर क्रांतिकारियों को लाठी - तलवार आदि चलाने बम बनाने की शिक्षा देने लगे ।अपनी गतिविधि से वे पुलीस के आँखों में खटकने लगे । 1908 में सी.आई.डी. वाले को किसी ने मार दिया । इस केस में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया । पर प्रमाण के अभाव में उन्हें छोडना पड़ा । अनुशीलन समीति बंगाल , बिहार के साथ उत्तरप्रदेश में फ़ैल गई ।पुनः ढाका षड्यन्त्र में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया ।दो वर्षो तक विचारधीन कैदी के रूप में जेल में कैद रखा गया ।बाद में सात वर्षो की कारावास का दंड मिला । सजा भुगतने के बाद वे जैसे ही जेल से निकले पुनः उन्हें गिरफ्तार कर 1920 तक नजरबन्द कर दिया गया । जेल से छूटने के बाद पुलिन बिहारी दास कलकता आगये और भारत - सेवक - संघ के सचिव के रूप में पत्नी और सन्तान के साथ शान्ति पूर्वक जीवन यापन करने लगे । उनके कारावास के समय सरला घोषल ने अनुशीलन समिति की संचालिका के रूप संघटन कार्य को आगे बढ़या ।श्री पुलिन बिहारी दास का जन्म 28 जून 1877 को बंगाल के फरीदपुर जिला में हुआ था ।*
       

चापेकर बन्धु



1894 में अपनी खोई हुई स्वतन्त्रता को प्राप्त करने के लिए पूना निवासी दामोदर चापेकर एवं बालकृष्ण चापेकर ने एक संघ की स्थापना की जो आगे चलकर चापेकर संघ के नाम से प्रसिद्द हुआ ।12 जनवरी 1897 में शिवाजी उत्सव मनाया । संघ का उदेश्य था धार्मिक आवरण में क्रान्ति का प्रचार करना ।बाल गंगाधर ने 1893 में गणेश उत्सव मनाया ।और शिवाजी उत्सव में भी उनका हाथ था ।
     1897 में पुन में प्लेग की बिमारी फैली । बिमारी की रोक थॉम के लिए सरकार ने कमिश्नर मि. रैण्ड और मि. आयसर्ट के नेतृत्व में एक कमिटी बनाई ।वे लोग प्लेग से इतने भयभीत थे की जिस पर भी प्लेग का सन्देह होता उसे प्लेग के कैम्प में पहुचा दिया जाता था ।कैम्प में रोगियों के साथ कुत्ते - बिल्लियों की तरह व्यवहार होता था । लोग कैम्प के अत्यचार से घबरा उठते ।जिन्हें रोग होता वह भी छिपाने लगता । एक मुहल्ला में पता चला की की प्लेग से पीड़ित है । वहां सभी लोगो को कैम्प में जबरन पकड़ कर ठुस दिया गया ।और घरो में आग लगा दिया गया । चापेकर बन्धु ने इस जुल्म को करने वाले को मार देने के संकल्प लिया । और मि. रैण्ड और आयसर्ट को गोली मार दिया ।*
   दो व्यक्तियों ने चापेकर बन्धुओं का नाम बतला दिया ।और गवाही भी दिए जिसके कारण चापेकर बन्धु को फांसी पर लटका दिया गया ।गिरफ्तार कराने वाले को सरकार के तरफ से इनाम तो मिला पर चापेकर संघ के किसी सदस्य ने दोनों को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया ।

         श्री अरविन्द घोष


       अलीपुर षड्यन्त्र के बन्दियों को जेल में एक ही कमरे में रखा गया था पर मुखबिर नरेंद्र के हत्या के बाद सभी बंदियो को अलग अलग सेलो में बन्द कर दिया गया ।सिर्फ मुकदमे की सुनवाई के समय वे लोग एक साथ होते थे । अरविन्द की ओर से मुकदमे की पैरवी देशबन्धु चितरंजन दास कर रहे थे ।जो उस समय के प्रसिद्द वकील थे ।
        श्री अरविन्द जेल से निकलने के बाद " कर्मयोगी " एवं " धर्म " नामक साप्ताहिक पत्रिका के सम्पादक बन गए ।वह बराबर समझौता नही का नारा लगाते रहे । देशवासियों के नाम खुली चिठ्ठी " कर्मयोगी " में प्रकाशित कर घोषणा कि- अधिकार प्राप्त किये वैगर कोई सहयोग नही ही सकता .....।'
       
       वे सरकार के आँखों के काँटा बन गए थे । एक रात कर्मयोगी के कार्यालय में सुचना मिली की पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने के लिए छापा मारने वाली है ।वे अविलम्ब वहां से भाग गए । वे जहाज पर छुप कर 4 अप्रैल 1910 को पांडिचेरी पहुँच गए । वहां कुछ दिनों तक एक आश्रम में साधना में लीन रहे ।1914 तक एकांतवास में रहने के बाद 'आर्य ' नामक दर्शन संबन्धी एक मासिक पत्रिका प्रकाशित करना आरम्भ किया ।1921 तक लगातार प्रकाशित होता रहा ।
    4 दिसम्बर 1950 ई. को रात्रि में योगिराज अरविन्द घोष ने आश्रम में ही अपने शरीर को त्याग दिया ।

सामना करेंगे शक्तिशाली सितमगारों का ,
दमन का न भय , नाको चने चबवायेंगे !
स्वतन्त्रता संग्राम के हम तो सिपाही है ,
प्राण देकर , ऋण मातृभूमि का चुकायेंगे !!
       
           
     
   
   

रविवार, 13 मार्च 2016

आदमी

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                  आदमी 


आज पीतल का मुलमा हो रहा है आदमी ,

जिंदगी का बोझ सर पे ढो रहा है आदमी ,


कब तक पिसेगी अंधी और कुत्ते खाएंगे ,

आज स्वयं ही आदमी को खा रहा आदमी ।

शुक्रवार, 11 मार्च 2016

पब्लिक स्कुल

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                              पब्लिक स्कुल




    ये भविष्य का पाठ पढ़ा रहे है हमारे बच्चों को , अपने विधार्थी को ,पूरी की पूरी नई पीढ़ी को ।ऐसा पाठ जो जिंदगी में घिसिट- घिसिट कर जिना न पड़े ।सुविधाओं के लिये दुसरो का मोहताज नही होना पड़े ।जमाना चाहे चोली के पीछे झांकने का हो या कम्प्यूटर विजार्ड का, वह कदमो में हो ।आदमियत हो न हो पर कामयाबी मुठ्ठी में हो ।जो खूबसूरत दिखे उसे हासिल करो और रस की बून्द चूसो और पैरो की ठोकर से दूर करो ।बिहेब योर सेल्फ माँम ।माइंड योर बिजनेस डैड ।हर तरह के हथियारो से लैस , चतुर चौकन्नी पीढ़ी ।आने वाले युग के लिये बख्तरबंद ।चीज बड़ी है मस्त - मस्त नानसेंस वाव् ।


           

                          ये पब्लिक स्कुल है ।गलियों में , मोहल्लों में , राजधानी के संभ्रांत इलाको से लेकर गावों एवं आदिवासी इलाको तक कुकुरमूते की तरह उगे हुए है । दो कमरो के मकान से लेकर नगर निगम के पार्क तक में जहां जगह मिले ।पब्लिक स्कुलो का नामकरण किड गार्डेन , मोंन्टेन्सरी , किड्स होम किसी भी ईसाई सन्त के नाम से लेकर माता जी के नाम पर कर सकते है ।नेता , अभिनेता , औधोगिक घरानो , इतिहासिक पुरुषो , और शब्दकोशों से चुन कर किसी जटिल संस्कृत निष्ट नाम वाले नाम । काल्पनिक अंग्रेजी नाम पर आधारित और कुछ न हो तो लन्दन के जुआ घर के नाम पर ही । यहां जानता कौन है ? सारे पब्लिक स्कुल आधुनिक शिक्षा पद्धति के स्वघोषित अग्रदूत । सब के सब लगे हुये है आने वाली पीढ़ी को दक्ष बनाने में ।


       

                   लेकिन वे स्वयं दिग्भर्मित है । शिक्षा के क्षेत्र में चल रहे आधुनिक प्रयोग की उन्हें जानकारी नही है । न इतने संसाधन है , न जानने की इच्छा । अपनी परम्परा , अपना समाज उनके हाथो से छूटते जा रहा है । वे क्या पढ़ा रहे है इसका कोई मौलिक तर्क नही है उनके पास । वे पढ़ा रहे है क्योंकि सब पढ़ा रहे है । वे सीखा रहे है क्योंकि सब सिखा रहे है । वे ये नही जानते की संस्कार कैसे विकसित किये जाते है । लेकिन आज के चमक-दमक के सामने खुद को फिसड्डी पाने वाले आज की रफ़्तार के मुकाबले खुद को सुस्त पाने वाले शिक्षक में परिणत हुए माता - पिता अपनी सारी कुंठा और हताशा छात्रो में उठेल दें रहें हैं ।


             

                     भविष्य की पाठ पढ़ाने वाली इन दिग्भर्मित पाठशालाओं का विस्तार अनन्त है ।10×10 कमरे से लेकर दसिओं एकड़ में फैले राजनीवासो की तरह ।कहीँ बैठने की टाट - पट्टी तक नही तो कहीँ वातानुकूलित पूर्व विकसित कम्प्यूटर कक्ष बने है ।कहीँ लाला जी दूकान में बैठे बैठे स्कुल का भी काम देख लेते है ।और कहीँ अच्छी खासी बहस करती प्रबन्ध समिति है ।कहीँ स्कुल के हिसाब किताब विधायक जी के साढ़ू देख लेते है ।कहीँ नर्सरी के बच्चे को पीने का पानी तक नही ।कहीँ महीने में एक बार डाक्टरी जाँच अनिवार्य है ।कोई पैमाना नही कोई मानक नही लेकिन है सब पब्लिक स्कुल ही ।


   

                         ये गारेंटी बेचते है , अलिखित , अनकही गारेंटी आपके बच्चे को ऐसा अंग्रेजीदां बनायेगे की आने वाले दिनों में कुछ भी हो जाय आपका बच्चा अफसर ही होगा ।ग्रूमड टू इन ऑफिसर । अंग्रेजी बोलता विदेशी साहबो की तरह यहां परम्पराओं से अनभिज्ञ , वाकी दुनिया को हिकारत से देखते हुए , अपने लिये सुख साधन जुटा सकने में निर्पूण , हाय , थैंक्स और माई फुट से सज्जित । आखिर और क्या चाहिये आपको ! जीवन की लड़ाई में कन्धे झुकाये बाप और नास्ते में सैंडविच बनाती माँ को इसे बेहतर गारेंटी और क्या चाहिये । ये गारेंटी चाहे स्कुल की प्रॉस्पेक्ट्स में लिखी हुई न हो पर चमकदार कागज पर हुई छपाई में है ।इतनी भब्य है की इसकी चकाचौध में अपने बच्चों को एडमिशन कराकर आह्लादित हो जाते है ।पलट कर कोई नही पूछता कि भाई ये जो ताम झाम फैला रही है वो किस लिये है ?


     

                           दाखिले के समय सारी पब्लिक स्कूले बड़ी बड़ी रकम लेकर अपना प्रॉस्पेक्ट्स बेचते है ।उनमे स्कुलो की इमारत से लेकर जिम्नेजियम तक की जानकारियां होती है ।जिलाधिकारी के साथ बैठक से लेकर , गणतन्त्र की परेड की झांकिया तक होती है ।लीं कोई स्कुल ये नही बताता की पढ़ाने वाले कौन है ? किस अतिरिक्त योग्यता के कारण आपके स्कुल के शिक्षक से श्रेष्ट है ! बताये कैसे ? बताने लायक हो तब न बताये । योग्यता वही जो सरकारी विधालयो में होती है ।तनख्वाह कम हो तो साल दो साल में छोड़ कर दूसरे स्कुल में चल दे , तो यह अतिरिक्त योग्यता हुई ।हां अंग्रेजी चासनी में जरूर सराबोर होना चाहिये ।इसिलिय तो बालकटि मैडम और टाई धारी टीचर का चलन ज्यादा है ।देश में कोई ऐसा पब्लिक स्कुल नही है जहां प्रबन्ध और बाल मनोविज्ञान पर शोध होता हो । जहां भविष्य के आकलन और समूह संचार प्रविधियां पर बहस होती हो ।जहां अच्छे टीचर की तलास की जाती हो ।और प्राथमिकता इसकी हो की पाठ कौन अच्छी तरह से पढ़ा सकता है ।चाहें तनख्वाह उचित ही क्यों न देनी पड़े ।लेकिन अपनी फ़ीस की रकम निर्धारित करने में विधालय स्वतन्त्र है ।शिक्षक की योग्यता के हिसाब से भले पैसा दे न दे पर बच्चों से तीन सौ के बदले पांच सौ , पांच सौ के बदले एक हजार वसूल कर सकते है ।क्योंकि वे दुसरो से अपने आपको श्रेष्ट दिखाना चाहते है ।क्योंकि इनके स्कुल में इनका अपना थियेटर है , अपनी प्रोजेक्टर है ,अपनी अस्तबल है ।

                 शिक्षक का स्तर वही है जो सरकारी विधालयो के शिक्षक की है । विषय वही है जो सरकार तय करती है ।शोध और अनुशांधान का जिम्मा सरकार की है । अंतर है तो सरकारी विधालयो की तरह वहां शिक्षिकाएं बैठकर स्वेटर नही बुनती और शिक्षक हाजिर लगाकर खेत में पटौनि करने नही जाते ।      वे इसलिये अलग है क्योंकि किताबे अलग है क्योंकि उसमे दुकानदारी है , परिधान अलग है क्योंकि उसे बेच कर कमाई की जाती है । भारी वास्ता , होमवर्क डायरी है इतना कुछ देखकर लगता है कि इतना कुछ है तो कुछ कर ही रहे होंगे ।बच्चे पर जितना वजन लदा रहता है उतना ही अभिभावक प्रसन्न रहते है । क्या गजब की पढ़ाई करा रहे है ।अभिभावक पर जितना भार पड़ता है वे उतने ही सन्तुष्ट दीखते है ।बड़ा ही स्ट्रिक्ट है भाई । क्या गजब का स्कुल है ।                 

                    भविष्य के पौधे बनाने वाले , आदर्श शिक्षा की गारेंटी देने वाले आधुनिक दुकानदार , सेवा की रामनवमी चादर ओढ़े , पब्लिक स्कुल उनको ये भी पता नही की वे क्या पढ़ा रहे है ? भूगोल क्यों पढ़ा रहे है ? क्योंकि माध्यमिक बोर्ड में है । परीक्षा के बाद इस विषय से क्या लाभ होगा ? इनको पता नही ।कोई विधालय पर्तदार चट्टान वाली मिटटी दिखाने नही लेजातें ।क्लास में बैठे -बैठे एक के बदले दो दो के बदले चार किताबे पढ़ा देंगे।क्योंकि किताबो से कमाई होती है ।विधालयो के द्वारा ही किताबे एवं स्टेशनरी बेचे जाते है ।खुद विधायलय ही पहले यूनिफार्म तय करेगा फिर विधालय ही यूनिफार्म बेचेगा ।यूनिफार्म बेचने से मुनाफा मिलेगा अलग और नही पहन कर जाने वाले बच्चों से हर्जाना मिलेगा ।इसके अलावा दंड क्योंकि स्कुल स्ट्रिक्ट है जो । आखिर पैसा कमाने के लिये कौन स्ट्रिक्ट नही होगा ।कम्पनी सिक्रेटरी , डाक्टर , एमबीए , का सपना देखने वाले पर्तदार चट्टान के बारे में जान कर क्या करेंगे ।पता नही क्यों इन्हें शहर की बनावट , शहर से गन्दे पानी की निकासी के बारे में जानकारी क्यों नही दी जाती । नही क्योंकि कोर्स में नही है ।किसी विधालय में इतनी साहस नही की बोर्ड के इम्तहान से बाहर निकल कर शिक्षा के क्षेत्र में अपनी चातुरी दिखाए ।हम वही पढ़ाएंगे जिनकी जीवन में जरूरी है ।यह साहस कोई नही करता ।लेकिन इन सब मामलो में इनके पास अदभुत तर्क है । जैसे कम्प्यूटर सिखाते है तो तर्क आने वाले दिनों के लिये उन्हें तैयार कर रहे है ।नही सीखा रहे है तो तर्क इतनी कम उम्र में यह बोझ डालना ठीक नही । बच्चे आपस में लड़ जाय तो तर्क हम एक साथ जीने और सम्भंधो को निर्धारित करने का अवसर देते है ।लड़ने पर शिक्षक पिटाई कर दे तो तर्क हम अनुशासनहिंता की इजाजत नही देते ।हर काम का उनके पास तय सूदा कारण है ।जिसे गलत दिखे वो खुद गलत ।बच्चों को पढ़ाना है तो चुप रहने में ही भलाई है ।  इन स्कुलो को आप मामूली न समझे । ये सबसे पहले बच्चों के माध्यम से सत्ता तक अपनी पैठ बनाते है । किसी के स्कुल में सचिव का बच्चा है तो किसी के स्कुल में सांसद के तो किसी के जिलाधिकारी के तो किसी के स्कुल में मुखिया जी के बच्चे पढ़ते है । जिस स्कुल में जितना प्रभावशाली बाप के बच्चे पढ़ते है वह स्कुल उतना ही महान । जिस स्कुल के सामने जितनी गाड़िया लगती है वह स्कुल उतना ही महान , आलीशान ।               


                  एक स्कुल है हरिद्वार में वह बच्चों की नाट्य क्षमता विकसित करने के लिये रामायण का मंचन करता है ।और सीता की भूमिका में देख कर बच्चे गाते है तू चीज बड़ी है मस्त मस्त ।एक स्कुल दिल्ली में है जहाँ 10वी , 12वी की क्षत्राओ को सेनेटरी टॉवेल मुफ़्त में दी जाती है , एक बार आजमाकर देखो ।कम्पनी उत्पाद से पढ़ाई का क्या सम्बन्ध ।राम सीता को देख कर मस्त मस्त क्यों गाता है यह पढ़ाई नही पश्चिमी सभ्यता की भड़उति है ।इसी तरह अगर यूरोप में मजाक उड़ाया जाता तो उसके औकात का पता चल जाता ।या लन्दन के किसी स्कुल में नैपकिन बाटा जाता तो स्कुल रसातल में चला जाता । लिकिन मामला हिंदुस्तान की है । पब्लिक स्कुलो की ऐसी मानसिकता इसलिये फल फूल रहा है की यहां के रिवाज , यहां की संस्कृति , यहां के लोग गुलाम है , घटिया है , ओछे है ।                  

            

                       कोई भी पब्लिक स्कुल अपने क्षत्रों से हिन्दुस्तान के गावों के बारे में नही बताते , वे क्षत्रों को मारुती और मर्सडीज के बारे में बताते । नीम के पत्ते और तुलसी के पत्तो से क्या फायदे है कोई नही बताता ।एक सर्वे के मुताबिक़ पब्लिक स्कुल के क्षात्रों को राष्ट्रीय गान , राष्ट्रीय पंक्षी जैसे तथ्यों की जानकारी नही होती ।वे जीवन को सेवा सम्बंधो की दृष्ट्री से नही देखते ।वे पेशे और कमाई के सन्दर्भों में सोचते है ।सरकारी स्कुलो के बच्चे आज भी यह कहते हुये मिलेंगे कि वे सेना में देश की रक्षा के लिए जायेंगे ।पब्लिक स्कुलो में यूज एन्ड थ्रो की ज्ञान पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है ।             एक स्कुल में खास रंग के जूते नही पहनने के कारण बच्चों को प्रताड़ित करता है । वन्दना की गीत गाने या गलियारे में अपनी मातृ भाषा में बाते करने पर पिटाई करते है ।हम धर्म और क्षेत्र की कट्टरता के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे है ।और यहां जूते के रंग और भाषा का भेद भाव के रुप में अनुशासन सिखाया जाता है ।            इसका अर्थ यह नही की सरकारी स्कूले बहुत ही अच्छे है । वहां गैर जिम्मेदारी की आलम यह है कि बच्चा स्कुल जाने की अपेक्षा अपने पिता की दूकान पर बैठ कर ज्यादा सिखलेता है । सरकारी स्कुलो की हाल अच्छी होती तो इस कदर पब्लिक स्कुलो की बाढ़ नही आती ।कूड़ा जब तक सड़ता नही तब तक उस पर कुकुर्मुते नही उगते । स्कुल पब्लिक हो या सरकारी वहां दी जाने वाली शिक्षा निरर्थक हो गई है ।शिक्षा देने की पद्धति बेकार हो गई है और शिक्षा देंने वाले चूक गए है । भौतिक के टीचर हिंदी गलत लिखते है इतिहास का टीचर अंग्रेजी गलत सीखा रहा है । पर स्कुल क्षात्रों से अपेक्षा रखता है की बच्चा भौतिक भी जाने , रसायन भी , हिंदी भी , अंग्रेजी भी जाने , संगीत भी जाने ।क्योंकि बोर्ड का इम्तहान जो देना है । पर मास्टर साहब के लिए जरूरी नही है क्योंकि वे संसारिक बन्धनो से मुक्त है ।                   

    

                     अभिभावक कुछ नही समझते एसी बात नही । पर वे लाचार है । कोई दूसरा विकल्प नही । वही हाल है लगभग पब्लिक स्कूलों एवं सरकारी स्कुलो की ।इसका जो छवि बन रही है वो इसे भी ज्यादा खतरनाक है ।लेकिन पुरे शिक्षातंत्र पर एक ही किस्म का आरोप नही लगाया जा सकता । कुछ सरकारी स्कूले भी अच्छी है , तो कुछ पब्लिक स्कुल भी ।वहां सदशिक्षा काम कर रही है । लेकिन उनकी संख्या बहुत ही कम है । इसलिये शिक्षा में बड़े पैमाने पर परिवर्तन की आवश्यकता है आखिर जमीन और जिंदगी से कटी हुई शिक्षा का क्या फायदा है ?


       



शनिवार, 5 मार्च 2016

sweet baby

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sweet baby

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

बल गया तो कुछ गया , चरित्र गया तो सब गया

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बल गया तो कुछ गया चरित्र गया तो सब गया 

  


 बल गया तो कुछ गया , 

धन गया तो कुछ गया , 

चरित्र गया तो सब कुछ गया । 

बलवान से कमजोर डरते है , 

धनवान से निर्धन डरते है , 

चरित्रवान से सब डरते है ।

रविवार, 7 फ़रवरी 2016

शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

नौजवान उठ करवट बदले तो इतिहास बदल सकता है

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नौजवान उठ करवट बदलेतो इतिहास बदल सकता है ।


 नौजवान उठ करवट बदले तो इतिहास बदल सकता है ।

 केवल भुजा उठाने से युग का विश्वास बदल सकता है ।।

 तेरी आशाओं में जग की आश जगती है और सोती है ।

 एक साथ साँस सभी लो तो आकाश बदल सकता है ।।

वो ऊपर वाले के बन्दे

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वो ऊपर वाले के मगरूर बन्दे


 वो ऊपर वाले के मगरूर बन्दे ।

 क्या धर्म भी सिखाता है काम गन्दे ।।

 धर्म के नाम पर पूरी दुनिया में रक्त पात ।

 मचाना कौन सा धर्म सिखाता है ।।

उस कलंकी फूल का मत नाम लो

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उस कलंकी फूल का मत नाम लो 


 उस कलंकी फूल का मत नाम लो ।


 जो इतरा रहा हो ताज पर ।।


सौ गुणा उसे सुगढ़ वह सूल जो ।


 जो दे रहा पहरा कली की लाज पर ।।

रहजन कभी थे आजकल रहजन होने लगे

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रहबर कभी थे आजकल रहजन होने लगे

 रहबर कभी थे आजकल रहजन होने लगे ।

 मूल्य सारे क्यों इस तरह खोने लगे ।। 

स्वार्थ की आग में जल गई इंसानियत ।

 दुश्मन की कौन पूछे दोस्त से डर लगने लगे ।। 

ज़मी पर था कभी अब आसमां को चूमता ।

 उसको इंसानियत का पाठ अब बेईमानी लगने लगे ।।

 आपने देखा अपना आज का ये हिंदुस्तान ।

 हर तरफ मुफ्लिसियों काम के केले लगे ।

 कोई मालामाल हो रहा ख्वाब गांधी का तो अब फानी लगे ।।

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

चरित्र गया तो सब गया

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बल गया तो कुछ गया

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बल गया तो कुछ गया , 


धन गया तो कुछ गया , 


चरित्र गया तो सब कुछ गया ।


बलवान से निर्धन डरते है ,


धनवान से निर्धन डरते है , 


चरित्रवान से सब डरते है ।

आत्मबल

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                          आत्मबल


 हमारे भाई यदि आत्मा और आत्मा के अस्तित्व पर विश्वास करते हो , तो वे इस बात को सहज ही विश्वास कर लेंगे - शासक हमारे शरीर के मालिक है , वे चाहे कैद करे , देश निर्वासन दे या फांसी दे किन्तु देशवासीयों का मत , आकांक्षाएं , अन्तःकरण और आत्माएं सर्वदा आकाश मुड़ने वाली पंक्षी की तरह आज़ाद है , तीखे तीखे बाण तक उन्हें बेध नही सकते । जिसका ईश्वर के सिवा अन्य कोई अवलम्ब नही है , वह जानता ही नही कि संसार में पराभव भी कोई चीज है ।" यदि संसार को आत्मा के अस्तित्व का विश्वास हो तो इस बात का सदा ध्यान रहना चाहिए , शारीरिक बल की अपेक्षा आत्मिक बल ही श्रेष्ठ है । आत्म बल वह है जिसे पर्वत भी हिल जाते है । हम आत्म बल से सब कुछ जीत सकते है ।आत्मा की शक्ति के आगे शरीर की शक्ति तृणवत् है ।इसलिये आत्म ज्ञान प्राप्त करना हमारा सबसे पहला और आवश्यक कर्तब्य है । चरित्र के द्वारा प्राप्त होता है आत्म ज्ञान । चरित्रवान व्यक्ति ही सत्य , अहिंसा , ब्रह्मचर्य , अपरिग्रह , निर्भयता आदि गुणों का पालन कर सकता है ।

बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

23 दिसम्बर 1912 को लार्ड हार्डिंग पर बम

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जिन बलिदानियों को हम भूल गए ।

      23 दिसम्बर , 1912 ई. को लार्ड हार्डिंग पर बम 23 दिसम्बर , 1912 ई, के दिन लार्ड हार्डिंग की सवारी दिल्ली से निकलने वाली थी । जगह- जगह भारी सुरक्षा की व्यवस्था थी । शानो - शौकत की तमाशा देखने के लिये अपार जन समूह एकत्र था ।बादशाही ठाट में सजे - सजाये हाथी पर लार्ड बैठे झूम रहे थे ।आगे पीछे फ़ौज पुलिस की कतार ...। सवारी कोतवाली के सामने से मारवाड़ी लाइब्रेरी के पास पहुची तभी बम का जोरदार धमाका हुआ ।लार्ड का अंगरक्षक औंधे मुहँ गिर कर दम तोड़ रहा था और लार्ड औंधे मुहँ गिर पड़ा । संयोग से लार्ड बच गया । कुछ देर बाद लार्ड अपने जगह पर दिखाई पड़े ।और उनकी सवारी आगे निकल गई ।उसके बाद उपस्थित दर्शको को घेर लिया गया ।उनकी घण्टो तलाशी हुई ।महिलाओं को तलाशी के दौरान अपमानित किया गया । पर बम फेकने वाले का पता न चला ।


            लॉरेंस गार्डेन , लाहौर के एक बम केस में पुलिस श्री अवध बिहारी लाल को खोज रही थी ।राजा बाजार कलकत्ता में एक छापे मारी के दौरान उनका पता पुलिस को मिल गया ।उस पते के आधार पर पुलिस अमीरचंद के घर की तलाशी ली । अमिरचन्द्र दिल्ली के कॉम्ब्रिज मिशन है स्कुल में अध्यापक थे ।घर में अवध बिहारी लाल अपने दो साथी के साथ एक टोपी बम के साथ पकड़े गए ।साथ में लाहौर से भेजा गया दीनानाथ का एक पत्र भी सी . आई.डी. वालो के हाथ लग गया । उस समय मास्टर घर पर नही थे ।पर उनका दत्तक पुत्र सुलतान मौजूद था ।पुलिस उन सबको पकड़ कर ले गई ।रास्ते में मास्टर अमीचन्द घर लौटते समय पुलिस के हाथो लग गए ।


            सुलतान को डरा धमाकर पुलिस ने अपना पक्षधर बना लिया । वह घर में आने जाने वाले क्रांतिकारियों का पता बता दिया ।साथ ही दीनानाथ के लिखावट को भी पहचान कर पुलिस को बता दिया ।दिल्ली षड्यंत्र के नाम से मुकदमा चला । मास्टर अमीरचंद , अवधबिहारी लाल , बालमुकुंद और बसन्त कुमार को फंसी की सजा मिली । संगठनकर्ता रासबिहारी बोस इन लोगो के गिरफ्तारी के बाद दिल्ली छोड़ दिए ।


          देहरादून के फारेस्ट रिसर्च इंस्टीच्यूट में हेड क्लर्क रासबिहारी बोस थे ।उसने अमेरिका के सुप्रसिद् हिन्दुस्तानी विद्रोही लाला हरदयाल के एक शिष्य दीनानाथ , अवध बिहारी , बालमुकुंद को पर्चा बाटने और बम फेकने के लिये ठीक किये ।उनका एक बंगाली नौकर बसन्त कुमार विश्वास भी इस काम में उन लोगो का सहयोगी था । दिल्ली बम कांड केस में जैसी गवाही हुई उसे साबित हो गया की लार्ड पर बम फेकने में इनका हाथ था । इस मामले में अवध बिहारी , अमीरचंद और बसन्त को फांसी की सजा हुई ।पर आश्चर्य की बात , रासबिहारी बोस इतना अत्यंत बलवान और भीमकाय पुरुष थे पर कैसे पुलिस से बच कर भाग गए ।

              आगे लाला हरदयाल और रास बिहारी बोस एवं अनेक क्रान्तिकारीयों को जिनके बलिदानो के फलस्वरूप हम आज़ाद हुए , जिन्हें हम जानते तक नही या हम भूल चुके उन क्रांतिकारीयों के करनामें ।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

दवा ही बन गई मर्ज क्या किया जाय

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दवा ही बन गई मर्ज क्या किया जाय 


दवा ही बन गई मर्ज क्या किया जाय , 

मसीहा हो गया है खुदगर्ज क्या किया जाय ।

 मिले हर एक को रोटी , मकान और कपड़े , 

किया है सबने यही अर्ज क्या किया जाय ।

 नही है कोई महफूज इस सियासत में ,

 रपट भी नही होती दर्ज क्या किया जाय ।

माँ का पैर दबाना भी मुहब्बत है

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अपनी माँ का पैर दबाना भी मुहब्बत है 

  


 किसी बिमारी की अयादत को .. जाना भी मुहब्बत है ।

 किसी भूखे को दो रोटी खिलाना भी मुहब्बत है ।।

 बहुत तन्हा शज़र दीखता है पर हकीकत नही है ये ।

 बनाना किसी शाख़ पर आशियाना भी मुहब्बत है ।। 

 मज़ा देती है तन्हाई जो जीने का सलीका हो ।

 कभी तन्हाई में कुछ गुनगुना भी मुहब्बत है ।।

 हो अखलाख दिल में तो , इबादत है बहुत आसाँ । 

कि अपनी माँ का पैर दबाना भी मुहब्बत है ।। 

 इस इश्क में अश्को के आगे भी बहुत कुछ है ।

 किसी के आँख से आंसू चुराना भी मुहब्बत है ।।

लिखने वाले

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लिखने वाले कमाल .. लिखते है 



लिखने वाले कमाल ....लिखते है ।
अपने दिल का उबाल.......लिखते है ।।

मेरे महबूब की ...मासूमियत है ।
दिन तो गुजर गया ...साल लिखते है ।।

सियासी हरकते है ...पागलो सी ।
जबाब मांगों ...सवाल लिखते है ।।

उनकी इबादत .. सलाम के लायक है ।
अम्ल करके ... अमाल लिखते है ।।

ये वतन को जल कर रख देंगे ।
तील भी होता है ...ताड लिखते है ।।

भूखे पेट की गजल है ये ।
 रोटी -सब्जी दाल लिखते है ।।

कटेगी सिर्फ दिलासो से जिंदगी कब तक

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कटेगी सिर्फ दिलासो से जिंदगी कब तक



कटेगी सिर्फ दिलासो से जिंदगी कब तक ,
रहेगी लब पे गरीबो के खामोशी कब तक ,
बरक पे आने को बेताब हो रहा है अब ,
रहेगा हासिये पर आम आदमी कब तक ,
न जाने कब ये बुराई का सील कलम कर दे ,
सहेगें लोग सियासत की जिंदगी कब तक ।

लिखने वाले कमाल .... लिखते है

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लिखने वाले कमाल .. लिखते है



 लिखने वाले कमाल ....लिखते है ।
 अपने दिल का उबाल.......लिखते है । ।
 मेरे महबूब की ...मासूमियत है ।
 दिन तो गुजर गया ...साल लिखते है ।।
 सियासी हरकते है ...पागलो सी ।
 जबाब मांगों ...सवाल लिखते है ।।
 उनकी इबादत .. सलाम के लायक है ।
 अम्ल करके ... अमाल लिखते है ।।
 ये वतन को जल कर रख देंगे ।
 तील भी होता है ...ताड लिखते है ।।
 भूखे पेट की गजल है ये ।
 रोटी -सब्जी दाल लिखते है ।।

रविवार, 31 जनवरी 2016

यहां आते है मंत्री भी संतरी भी

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यहां आते है मंत्री भी , संतरी भी , 

इज्जतदार भी , रंगदार भी ,


आइये बाबू आई स्वागत है बेतिया के इस लाल बत्ती इलाके में ,
चुनिए इनमे से बेहिचक किसी को कर्ज में डूबा बाप बेच गया
 किसी को पति तो किसी को प्रेमी तो किसी को चाचा
 सबकी सब माल एकदम चोखा है बाबू भूख ,
 दंगा , बलत्कार यहा हर चीज की शिकार लडकिया
 मिल जायेगी सीतामढ़ी से सीवान तक
बंगाल से लकर नेपाल तक , कहि का भी माल चुन सकते है दाम की चिंता मत कीजिये
कम बेसी तो हो ही जाएगा ।
 और फिर तो आप हमारे नए ग्राहक है
अरे ना ना शर्माइये नही
 यहा दस बर्ष के लौंडे से लेकर अस्सी बर्ष के बूढ़े तक आते है
आप नाहक डर रहे है यहां संतरी से लेकर मंत्री तक आते है
 आइये आपको आपके लायक एकदम टकाटक माल दिखाता हूँ
 ये देखिये हफ्ते भर पहले आई है बेच गया नौकरी का झांसा देकर कोई साला
 यह देख रहे हो न तीन गुना पांच के धुप कोठरी
इसे टार्चर चेम्बर कहते है उसे इसी टार्चर चेम्बर में रखा जाता है
 भूखे प्यासे तीन चार दिन कभी कभी तो पांच चार एक साथ
 ये उठ साहब को सलाम कर
 और ये देखिये कमसिन कम उम्र इसकी तो माहवारी भी अभी नही फूटी
 क्या कीजियेगा बाबू देह का धंधा ही ऐसा है
 एकदम मरियल सी आई थी
 पर एक महीने में ही दनदना के जवान हो गई है साली
 वैसे अब इस धंधे को भी काम का दर्जा दीये जाने का हल्ला है
 अरे बाप रे बाप बहुत देर हो गई
 जाइए जल्दी से निपटाइये
और ग्राहक है और हाँ पुलिसिया वर्दी देखकर एकदम डरियेगा मत
 कमबख्त हफ्ता वसूलने के साथ साले ये भी छोटी गंगा में डुबकी लगाकर जाते है
 लौटते वक्त घड़बडाइयेगा नही
 यहां संतरी से लेकर मंत्री तक आते है इज्जतदार से लेकर रंगदार तक आते है ।

अब किसको किसको मापोगे

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अब किसको -किसको मापेगें


अब किसको किसको मापेगें  ।

 तोड़ चुके पैमाने लोग ।।

 

नाका बिल पैताने के भी  ।

 बैठे है सिरहाने लोग ।। 

पहने फूलो की माला

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जागो अब जागो 

पहने फूलो का माला ,

बनता जन का रखवाला ,

 निर्धन का छीननेवाला ,

 करता नित दिन घोटाला,

 बोलता गांधी का भाषा ,

सब बढ़े यही अभिलाषा ,

 जन्मे तो घोर निराशा ,

निर्धन नीच हो जाता ,

 दो जून नही खा पाता ,

बस ये ही है उन्हें भाता ,

चुने देख भाग्य विधाता,

 निचे धरती ऊपर नेता,

 पंक्षी करते कलरव,

 करते धोखा ये नेता,

 आ गया वक्त ,

अब जागो अब जागो अब।।

शनिवार, 30 जनवरी 2016

सम्प्रदायी अग्नि चिंगारी रह -रह हमे जलाती

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सम्प्रदायी अग्नि चिंगारी रह - रह हमे जलाती ।




सम्प्रदायि अग्नि चिंगारी रह - रह हमे जलाती ,

 आपस के ही बैर फूट से , सर पर पड़ी गुलामी ।

अपना नाश किया तन मन धन , बने भिखारी स्वामी ।

 ठोकर खाये पग -पग पर , फिर भी लाज न आती । 

सम्प्रदायी अग्नि चिंगारी , रह - रह हमे जलाती ।।

गुरुवार, 28 जनवरी 2016

हर व्यक्ति अपने आपको सफल समझता है

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हर व्यक्ति अपने आपको सफल समझता हैं

अमर शहीद खुदीराम बोस एवं प्रफुल्ल चाकी

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अमर शहीद खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी              



खुदीराम बोस मेदिनपुर के निवासी थे ।बहूवैनी गांव में उनका पैतृक घर था ।उनके पिता तैर्लोक्यनाथ बोस तहसीलदार थे ।माता का नाम- लक्ष्मीप्रिया देवी ।जन्म तिथि 3 दिसम्बर 1889 ई.। उनकी विप्लव पार्टी के नेता श्री सत्येंद्र बोस थे ।         

क्रांतिकारियों ने छोटेलाल और कलकते के ही एक प्रेसिडेंसी मैजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड को प्राण दंड देने का निर्णय लिया ।लाट बंग - भंग कार्यान्वित करने का अपराधी था ।और किंग्सफोर्ड ने अपने इजलास के सामने नारा लगाने और पुलिस से झगड़ने के कारण सुशिल सेन नामक एक युवक को पन्द्रह बेत मारने की सजा दी थी । और उसने बंग - भंग के विरोध में लिखे गए लेखो को राजद्रोहात्मक ठहराकर कई लेखको , पत्रकारो को दण्डित किया था ।              

6 दिसम्बर , 1907 को वह गवर्नर ट्रेन से जा रहा था । एक जगह जोरदार बम का धमाका हुआ । जिस डिब्बे में वह बैठा था उसे उड़ाने का उद्देश्य था संयोग से उसके पीछे वाला डिब्बा निशाना बना ।वह डिब्बा चूर चूर हो गया ।गवर्नर बाल बाल बच गया ।  बम मारने वाला का पता नही चला ।       

           खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने किंगस्फोरड को मारने का भार अपने कन्धों पर सहर्ष उठाया ।वे सुशील सेन की पिटाई को नही भूले थे ।बदला लेने के लिये उतावले थे ।       चाकी ' बाकुंडा ' के निवासी थे ।दोनों बिप्लवि शाखाएं श्री अरविन्द से प्रभावित थे ।चाकी के दल के नेता नेता थे यतीन्द्र राय ।गवर्नर बम कांड में श्री हेमचन्द्र के सहयोगी थे प्रफुल्ल चाकी । किंग्सफोर्ड कलकते से मुजफरपुर चला आया सेशन जज बनकर ।उसकी सुरक्षा के लिए दो सशस्त्र जवान हमेशा लगे रहते थे ।                 

                  प्रफुल्ल चाकी के साथ खुदीराम बोस भी मुजफरपुर पहुच गए । स्टेशन के समीप ही मोतीझील धर्मशाला में ठहर कर दोनों अवसर की तलाश करने लगे ।उनके पास जो बम थे उनको बनाने वाले थे उल्लासकर दत्त और हेमचन्द्र ।          वहां अंग्रेजो का एक क्लब था ।उसके निकट ही किंग्सफोर्ड का निवास था ।वह प्रत्येक दिन क्लब में जाता और घण्टे दो घण्टे बाद क्लब से वापस आता । खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने उसके लौटते समय बम मारने का निर्णय लिया । उसके गाडी और घोड़े की पहचान उन दोनों ने कर ली ।          लगभग बारह दिनों बाद 30 अप्रैल 1908 को अनुकूल अवसर मिला , वे दोनों तैयार हो कर क्लब के पास पहुचे ।उन दिन पहरे पर फैजुद्दीन और तहसिलदार खाँ नामक पुलिस के जवान तैनात थे ।उनकी नजर उन दोनों युवकों पर पड़ी ।उन्होंने डाट कर दोनों युवको को भगा दिया ।

दोनों सड़क के किनारे एक पेड़ के पीछे छिप कर किंग्सफोर्ड कर लौटने की प्रतीक्षा करने लगे । एक घोडा गाडी क्लब से निकली । दोनों सावधान हो गये । रात्रि के आठ बज रहे थे ।आँधियारी रात ! वह घोड़ा गाडी सामने से गुजरने लगी ।किंग्सफोर्ड की गाडी की तरह गाडी और वैसा ही घोड़ ..... पहरेदार ने जोरदार बम का धमाके सुना ।दोनों घटना स्थल की और दौड़ पड़े ।उन्होंने दोनों युवको को भागते हुए देखा ।अंधरे में उनकी आकृति देखकर पहचान गए की वे दोनों वही युवक है , जिन्हें क्लब के पास से कुछ समय पहले भगाया था ।    फिटन के टुकड़े बिखर गए ।एक गोरा वकील पी . केनेडी की पत्नी और उसकी बेटी घायल होकर तडप रही थी ।कोचवान भी घायल हो गया था । तहसीलदार खान ने थाने में सुचना पहुचाया । और बम मारने वाले की हुलिया भी लिखवाया । नगर की घेराबन्दी हो गई ।      किंग्सफोर्ड और केनेडी की फिटन एक जैसी थी ।दोनों के घोड़े के रंग एक जैसे थे । केनेडी के पुत्री कुछ देर बाद मर गई , किन्तु उनकी पत्नी दो दिनों बाद 2 मई को मर गई ।

        बम कांड के बाद दोनों रेलपथ के किनारे किनारे पूरब की और निकल गए । वे सिलौत और ढोली से गुजरते हुये पुसारोड स्टेशन पहुचे ।आगे की यात्रा अलग अलग करने का निर्णय किया गया ।एक साथ रहने से पुलिस के पकड़ में आने की सम्भावना ज्यादा थी । निकट में ही बैनी नामक बाजार था । चाकी को बगीचे में छोड़कर खुदीराम बाजार में पहुचे , और निरसु नामक एक एक दुकानदार के दूकान में  दही चुडा खाने बैठे गए ।    एक चौकीदार उसी दूकान में पहले से बैठ था उसकी दृष्टि खुदीराम पर पड़ी । घुंघराले बाल , लम्बा मूंछ सत्रह अठारह साल का बंगाली युवक ।उसे सन्देह हुआ । थाने के दरोगा ने जिन दो युवको पकड़ने को आदेश दिया था उनमे से एक का हुलिया उससे मिलता था ।वह खुदीराम की गतिबिधि पर ध्यान देने लगा ।  वहां अन्य लोग वार्तालाप कर रहे थे ।उनकी बातचीत का विषय था मुजफरबमकाण्ड .... बम से वकील केनेडी की बेटी मर गई और उसकी पत्नी भी बचने वाली नही है । कान में पड़ते ही खुदी राम अचानक चौक पड़े , वे दही चूड़ा खा रहे थे और खाते खाते उनके हाथ रुक गए । पूछ बैठे - क्या किंग्सफोर्ड नही मरा ।         

                चौकीदार का सन्देह विश्वास में बदल गया ।वह दूकान के बाहर निकल गया ।निरसु साह के दूकान के सामने ही कल्लू मारवाड़ी के कपड़े की दूकान में शिवप्रसाद सिंह और फतह सिंह नामक दो सिपाही सादे लिवास में दूकान में बैठे थे ।चौकीदार से सुचना मिलते ही वे दोनों ने खुदिराम को वे जब हाथ धो रहे थे दबोच लिया ।कुँए से पानी निकालने वाली रस्सी से हाथ बाँध कर सिपाहियो ने उन्हें थाने में पहुचाया ।उनके पास से एक भरी हु बन्दूक और एक रिवाल्वर बरामद हुआ ।उन दोनों सिपाहियो द्वारा ही उन्हें मुजफरपुर भेजवाया ।दर्शको ने आश्चर्यचकित हो कर देखा कि खुदीराम के चहरे पर उदासी की छाया नामात्र भी नही थी वे मुस्करा रहे थे ।   खुदीराम बोस के विरुद्द तीन सौ दो का धारा लगाकर मुकदमा चला । उनके तरफ से काम करने के लिए कोई भी वकील तैयार नही हो रहे थे तब स्थानीय वकील कालिदास बोस ने कमर कसी ।सरकारी वकील थे पटना के मानक साहब और बिनोद मजूमदार ।खुदीराम बोस के खिलाफ दोष साबीत नही हुआ किन्तु उन्होंने साहस पूर्वक स्वीकार किया कि हमने ही बम फेका था । उन्हें फांसी की सजा मिली । 11 अक्टूबर 1908 को फांसी का दिन निश्चित किया गया ।   खुदीराम हँसते हँसते फांसी पर लटक गए । उनके मुँह से निकले बन्दे मातरम् और उनके हाथ में थी गीता का किताब ।और इस तरह वे शहीद हो गए ।उनकी इच्छा अनुसार उनका अंतिम संस्कार कालिदास बोस द्वारा सम्पन हुआ ।फूलो से अरथी सजाई गई । अखड़ाघाट बूढी गंडक के किनारे , चिता पर उनके पार्थिव शरीर को मुख अग्नि दिया गया। अपार जनता श्मशान यात्र में सम्मलित हुए और चिता भस्म को माथे पर लगाते हुये अपनी श्रधांजलि अर्पित की । 

 उनकी बलिदान पर किसी देशभक्त ने यह छंद लिखा है :-

शहीदों के खूँ का असर देख लेना ।

 मिटायेंगे जालिम का घर देख लेना ।। 

 झुका देंगे गर्दन को हम जेरे खंजर । 

 ख़ुशी से कतायेगें सर देख लेना। । 

 जो खुदगर्ज गोली चलाएंगे हम पर । 

 तो कदमो में उनका ही सर देख लेना ।।                

           उधर पूसा के बगीचे से प्रफुल कुमार चाकी समस्तीपुर की ओर बढ़े ।दोपहर तक वे वहां पहुँच गए ।चेहरे पे थकावट के चिन्ह् थे और भूख सता रही थी ।रेलवे कर्मचारी के क्वाटर्स की ओर घूमते हुए ट्रेन की प्रतीक्षा कर रहे थे ।एक रेलवे कर्मचारी का ध्यान उनकी ओर आकर्षित हुआ , अखबारो में बम कांड के बारे में छपी थी और उसने पढ़ी थी ।चाकी से उसने पूछताछ की उन्होंने टालना चाहा ।कर्मचारी देशभक्त था ।उसने सहानुभूति प्रकट करते हुए चाकी को राजी कर लिया अपने क्वाटर्र में समय गुजारने के लिये ।       चाकी ने उस देश भक्त के यहां खाना खाने के साथ रात्रि विश्राम भी किया ।दूसरे दिन , दो मई को वे ट्रेन में सवार हुये । कलकते की रेल टिकट भी उस कर्मचारी के द्वारा प्राप्त हुआ । जिस डिब्बे में चाकी घुसे उसमे नन्दलाल बनर्जी नामक दरोगा भी यात्रा कर रहा था । सिंहभूमि के थाने में वह पदस्थापित था ।अवकाश के दिनों में वह अपने नाना शिवचन्द्र चटर्जी के यहां व्यतीत कर , सिंहभूमि वापस जा रहा था ।वह बमकांड के दिन मुजफरपुर में ही था । उसे घटना की जनकारी थी ।     चाकी पर नजर पड़ते ही वह इंस्पेक्टर चूक पड़ा । चौड़ा मुँह , सर पर छोटे छोटे बाल , कसरती बदन , नई उभरती मूंछ - बम फेकने वालो में से एक की हुलिया उसे मिलता था ।उस इंस्पेक्टर ने उसे बात करने की प्रयास किया चाकी अनसुनी कर दी ।बनर्जी का सन्देह बढ़ा ।           

अगले स्टेशन पर चाकी दूसरे डब्बे में चले गए ।बनर्जी की नजर उनका पीछा कर रहा था । उसने मुजफरपुर अधीक्षक के नाम एक तार भेजा । ट्रेन मोकामा पहुची ।वहां चाकी को गिरफ्तारी का तार मिल गई ।वह स्टेशन मास्टर के सहयोग से कुछ रेलकर्मियों के सहयोग से चाकी को पकड़ने चला ।मुझे आपको गिरफ्तार करना है .. सन्देह पर .. बनर्जी ने प्लेटफार्म पर टहलते हुये चाकी को रोक कर कहा । और उसका वाक्य अधूरा ही रहा - चाकी ने अपनी पिस्तौल से उस पर गोली चला दी ।निशाना चूक गया ।बनर्जी झुक गया उसके सर के ऊपर से गोली निकल गई । रेल कर्मचारी चाकी को पकड़ने के लिए दौड़े ।पकड़े जाने के पहले प्रफुल्ल चाकी ने गोली मारकर आत्महत्या कर ली ।शहीद होने के पश्चात भी उनके चहरे पर स्वभिमान और आक्रोश की झलक थी ।      कुछ दिनों बाद एक फिन सियालदह के किसी गली से गुजरते हुये क्रांतिकारी जी . दास गुप्ता ने गोली से उडा दिया ।बनर्जी को चाकी को पकड़ने के प्रयास के कारण प्रोन्नति हो गई थी ।              

जहाँ से खुदीराम बोस ने केनेडी की गाडी पर बम फेक था वहां उनकी मूर्ति स्मारक के रूप में अवस्थित है ।बैनी बाजार में निरसु साह क्व दूकान में जहाँ दही चुडा खाया वह भी था वहा भी उनका स्मारक बना जिसका उद्घाटन भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद के द्वारा उद्घाघाटन हुआ । अमर रहेगा नाम शहीदों , सूरज चन्द्र समान । अमर बना इतिहास , लहू का अंकित अमिट निशान ।। 

 (बिंध्याचल प्रसाद की रचना के कुछ अंश )

मंगलवार, 26 जनवरी 2016

काश मैं भी बच्चा होता

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काश मै भी बच्चा होता





काश मैं भी बच्चा होता ,

मेरा मन भी सच्चा होता ।

न हिन्दू मुस्लिम का नफरत होता,

न उच्च नीच का भेद होता ,

न अमीरी गरीबी का खाई होता ,

काश मैं भी बच्चा होता ,

मेरा मन भी सच्चा होता ।



सोमवार, 25 जनवरी 2016

लोकतंत्र की लाज बचाओ

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लोकतन्त्र की भारत रोता



लोकतंत्र का भारत रोता ,
लोकतंत्र की लाज बचाओ ।

फिर से कोई गांधी लाओ ,
लाल बहादुर और सुभाष लाओ।

नेता लूट-लूट कर बिदेशो में जमा करते ,
जब देखो तब टेक्स बढ़ातें ।

अगर संभव हो तो ,
गरीबो को हक दिलवाओ ।

सच्चाई बेहोश पड़ी है ,
सीना ताने अनीति खड़ी है ।

पुलिस नपुंसक हुई हमारी ,
हाल ह्रदय को किसे बताऊ ।

नई सदी चल रही आज फिर ,
अजब गजब वह ढ़ाती जाती ।

कुछ तो अब करतब दिखाओ ,
भारत को अब खुशहाल बनाओ ।।

हम फूल नही अंगारे है

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हम फूल नही अंगारे है 

हम फूल नही अंगारे है,

माँ की आँखों की तारे है ।

पनघट में राह बनाते है ,

दुश्मनो को मजा चखाते है ।

हम हिन्दुस्तानी रिपुओं को ,

पल भर में मार भगाते है ।

मत करो हमला भारत पर ,

वरना पागलो पछताओगे ।

हम शोला बन कर बरसेगें ,

जल कर स्वाहा हो जाओगे । ।

आओ हम गणतंत्र मनाये

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           आओ हम गणतंत्र मनाये

       
राष्ट्र हितो के लिए समर्पित ,
हो फिर से सर्वस्य हमारा ,
गौरव मंडित हो भारत हमारा ,
सत्य धर्म को मिले सहारा ।
       
               त्यागे हम सब स्वार्थ भावना ,
               परमारथ का पथ अपनाये ,
               ऐसे हम गणतंत्र मनाये ।


चरित्रवान हो नेता सारे ,
नैतिकता का अनुपालन हो ,
राष्ट्र भक्ति की प्रखर भावना ,
भरी यहां के जन -जन मन हो ।

                त्याग बलिदान जागे फिर
                बलिपथ पर हम कदम बढ बढ़ायें ,
                ऐसे हम गणतंत्र मनाये ।

भष्ट्राचार मिठे शासन का ,
शुद्ध बने आचरण हमारा ,
अनाचार से लोहा लेने ,
बढ़े भारत के युवक सारा ।

          अनुशासित हो कर्मी सारे ,
          सतकर्मो को गले लगाये ,
          ऐसे हम गणतंत्र मनाये ।

महाशक्ति यह बने हमारा ,
स्वतन्त्रता के मानावत का ,
भूमण्डल को दे सन्देश ,
मित्र बने आपस में हम सब ,
मित्र भाव का हो विस्तार ,
उग्रवाद आतंकवाद का ,
हो यहा शीघ्र निस्तार ,
बच्चे बच्चे भारत के ,
       
              शौर्यशील बलशाली कहलाये ,
              आओ हम गणतंत्र मनाये ।

समरस हो सारा समाज यह ,
मानवता का बने हितैषी ,
सभी सुखी सम्पन बने फिर ,
प्रगति करे हम भौतिक ऐसी ,
राष्ट्र अस्मिता की रक्षा हित में ,
       
                  हर्षित हो कर प्राण लुटाए ,
                 ऐसे हम गणतंत्र मनाये ।।
भारत माता कीइइइइइ
जयययययय





सम्प्रदायिकता

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सम्प्रदायिता



सम्प्रदायिकता एक जहर है ,

किन्तु कहा है ,

किसके घर है .

इसकी परिभाषा होनी है ,

कौन करेगा ?


कुर्सी रक्षक वाद और वादो के पंख .

जिनके धर्म निरपेक्षि हमाम में ,

सब तो नंगे है ,

करवाते रोज दंगे है ,

स्वयं कांच के घर में रह कर ,

चला रहे है पत्थर ,

उनके वापस आने परह ,

कहा जाएंगे बच कर ,

कितना पतन करवाएंगे ,

ये वोट के चक्कर ?

रविवार, 24 जनवरी 2016

आज का समाजिक वातावरण बेहद अश्लील हो गया है

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आज का समाजिक वातावरण वेहद अश्लील हो गया है 

आज का समाजिक वातावरण बेहद अश्लील हो गया है , सौंदर्य ऐंद्रिक हो गया है , इंद्रिया देह हो गई है , देह काम हो गया है , काम दाम हा गया है । परिवार बाजार हो गये ।जन्मदात्री स्त्री वस्तु हो गई ह बिज्ञापन का माध्यम बनी, संस्कृति कामसूत्र का बिज्ञापन बन गई ।नई द्रोपदिया अपना दुपट्टा खुद उतार रही है ।हमारी देह और हम सुंदर है तो दिखने में हर्ज ही क्या ? सो देह दोखाने और देखने की होड़ लगी है । नग्न तस्वीरें और फिल्में आज की बाजार स्वभाविक हिस्से हो गए है ।बाजार में रोज नए उत्पाद की खोज हो रही है और इसके बिज्ञयापन के लिये नग्न हो जाने के लिये खोज जारी है ।बाजार ने देह को उपभोक्ता का वस्तु बनाया । संस्कृति और देह का नाता टूट गया ।यहां बाजार में हर चीज बिक रही है । काब्य , गीत , संगीत ,लोक , लाज , शर्म , मर्यादा , इज्जत , आबरु सब बिकाऊ हो गए है ।पता नही हम कितने निचे जायेगें ।हमे अपनी सभ्यता और संस्कृति की असली रूप को पहचानने ली जरूरत है ।


शनिवार, 23 जनवरी 2016

जीवन है एक चुनौती 

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जीवन है एक चुनौती






जीवन है एक चुनौती ,
हमेशा स्वीकार कीजिये ,
संघर्ष कठिनाइयों से झूझते हुए ,
निरन्तर मेहनत बेशुमार कीजिये ,
धैर्य में छिपी हुई है सफलता ,
पाने के लिए इंतजार कीजिये ,
मत बैठिये असफलता से हार कर ,
जित के लिये कोशिश बराबर कीजिये ,
कांटो से भरे होते है रास्ते लक्ष्य के ,
चुभते हुये उन्हें पार कीजिये ,
गिर कर भी संभलने की शक्ति हो ,
इतना खुद को तैयार कीजिये ,
इसलिये कभी न अहंकार कीजिये ,
जीवन एक चुनौती है ,
हमेशा स्वीकार कीजिये ।।

भ्रष्ट्राचार

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भ्रष्ट्राचार

दुनिया के किसी भी समाज में भ्रष्ट्राचार को संस्थागत रूप देने के तर्को को स्वीकार नही किया जाता ।लोकतंत्रिक समाज में इस बुराई से लड़ने के लिए साधारण जन ही आगे आते है ।हमारे यहां बदकिस्मती से जितने भी सत्ताधारी दल है प्रायः सभी दल एक ही थैली के चट्टे - बट्टे है ।जीवन का कोई भी क्षेत्र भ्रष्ट्राचार से मुक्त नही है ।और बिपक्ष भी इसका मूक समर्थन करती है और अपना दामन बचाने में लगी रहती है ।

जिन्हें तूने ह्रदय में स्थान न देकर अस्पृश्यता का दंश दिया

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ये मेरे अभागे देश


ये मेरे अभागे देश ,
जिन्हें तूने ह्रदय में स्थान न देकर ,
अस्पृश्यता का दंश दिया है ,
अपना समकक्ष बैठने की वंचना दिया है ,
और अपमानित किया है ,

एक दिन तुझे भी उनके साथ अपमानित होना होगा ,
जन्हें जातीय पहचान से जोड़कर ,
बृहत समाज में घुल मिल,
जाने से वंचित रखा ,
भुखमरी और अशिक्षा से प्रताड़ित किया ,
एक दिन तुझे उनके साथ अपमानित होना होगा ।
जिन्हें तूने अपने चरणों के पास आसन दिया है ,
उपेक्षा और निर्दयता दी है
वे तुम्हारा आँचल
कड़े है
और अपनी और खिंच रहे हैं ,
तुझे भी उनके साथ
अपमानित हिना होगा ।
सदियो से शोषित और लाचार है
हाथ पसारे या हाथ जोड़े
नतमस्तक रहते है ,
जिनके अस्तित्व को तुमने ,
भाग्य का बिडम्बना मान ,
उपेक्षित किया है ,
तुझे भी उनके साथ ,
अपमानित होना होगा ।
अब यदि तुमने उन्हें
अपनी गोद में उठाकर
गले न लगाया
तो वे तम्हें अपनी और खीच लेंगे ,
नीचे बहुत नीचे ,
अपने ह्रदय में स्थान न दिया
तो एक दिन
चिता की राख में उनके साथ मिलकर
तुझे भी अपमानित होना होगा ।।

एक बार भारत माँ तू माँ दुर्गा बनके आओ

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एक बार भारत माँ तू दुर्गा बनके आओ





है कराहता कण - कण

माँ सारे दुःख कष्ट मिटाओ ,

एक बार भारत माँ तू

माँ दुर्गा बनके आओ ।

झूट सत्य को निगल रहा

है गल्ली पुण्य की काया ,


दिशा - दिशा में क्रूर पाप ने

अपना जाल बिछाया ,

दो निष्ठा तप त्याग

प्रेम का अमृत कलश छलकाओ ,

एक बार भारत माँ तू

माँ दुर्गा बनके आओ ।


हुआ अस्त दिनकर विवेक का


महानाश गहराया ,

मिटी आज उर-उर से लो

शीतल करुण की छाया ,

भर हूंकूति सब मिटा धुंध

सुख शान्ति सब धरा पर लाओ ,

एक बात भारत माँ तू

माँ दुर्गा बनके आओ ।।



शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

जिंदगी बहूत छोटी है

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जिंदगी बहुत छोटी है




जिंदगी बहुत छोटी है ,
इसे यो न गवाइए ,
एक एक पल ख़ुशीयो का चुन कर,
खुशियों से नहाइये ,
गम तो आता ही है ,
प्यार से इसे बहाइये ,
यह सुंदर रीती है ,
प्रीत से इसे निभाइये ।
जिंदगी तो प्यार का गीत है ,
दिलखोल कर गाइए ,
कब तक बचियेगा सच्चाई से ,
सच्चाई तो संघर्ष है ,
उसे शौक से गले लगाइये ,
मिले जैसे भी रुत ,
उसमे घुल मिल जाइए ,
जिंदगी तो अवसर है ,
हंसकर इसे निभाइये ।।


मेरी प्रियेसी

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                          मेरी प्रियेसी





तुम्हारी कल्पना से परे सौंदर्य साम्राज्ञी है वह , बिन काजल के मृगनयनी के समान काले नयन ,घनेरी पलके झुके तो दिल को चयन नही , उठे तो कयामत आजाए , कमान सी भौवें और तेवर ऐसे वल्लाह ! रूपगर्विता की नाक की धार के सामने चमचमाती तलवार व्यर्थ ,और अधर ऐसे -हाय " शहद भरे अधर सन्तरे की फांक , जरा जुंबिश हो तो लगे रस टपक गया , सुराही दार गर्दन , लंबी घनेरी जुल्फे , खुल जाय तो घटा छा जाय .....


गुरुवार, 21 जनवरी 2016

पब्लिक स्कुल

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ये भविष्य का पाठ पढ़ा रहे है हमारे बच्चों को , अपने बिधार्थियों को ,पूरी की पूरी नई पीढ़ी को ।ऐसा पाठ जो जिंदगी में घिसिट- घिसिट कर जिना न पड़े ।सुविधाओं के लिये दुसरो का मोहताज नही होना पड़े ।जमाना चाहे चोली के पीछे झांकने का हो या कम्प्यूटर विजार्ड का, वह कदमो में हो ।आदमियत हो न हो पर कामयाबी मुठ्ठी में हो ।जो खूबसूरत दिखे उसे हासिल करो और रस की बून्द चूसो और पैरो की ठोकर से दूर करो ।बिहेब योर सेल्फ माँम ।माइंड योर बिजनेस डैड ।हर तरह के हथियारो से लैस , चतुर चौकन्नी पीढ़ी ।आने वाले युग के लिये बख्तरबंद ।चीज बड़ी है मस्त - मस्त नानसेंस वाव् ।
             ये पब्लिक स्कुल है ।गलियों में , मोहल्लों में , राजधानी के संभ्रांत इलाको से लेकर गावों एवं आदिवासी इलालो तक कुकुरमूते की तरह उगे हुए है । दो कमरो के मकान से लेकर नगर निगम के पार्क तक में जहां जगह मिले ।पब्लिक स्कुलो का नामकरण किड गार्डेन , मोंन्टेन्सरी , किड्स होम किसी भी ईसाई सन्त के नाम से लेकर माता जी के नाम पर कर सकते है ।नेता , अभिनेता , औधोगिक घरानो , इतिहासिक पुरुषो , और शब्दकोशों से चुन कर किसी जटिल संस्कृत निष्ट नाम वाले नाम । काल्पनिक अंग्रेजी नाम पर आधारित और कुछ न हो तो लन्दन के जुआ घर के नाम पर ही । यहां जानता कौन है ? सारे पब्लिक स्कुल आधुनिक शिक्षा पद्धति के स्वघोषित अग्रदूत । सब के सब लगे हुये है आने वाली पीढ़ी को दक्ष बनाने में ।
          लिकिन वे स्वयं दिग्भर्मित है । शिक्षा के क्षेत्र में चल रहे आधुनिक प्रयोग की उन्हें जानकारी नही है । न इतने संसाधन है , न जानने की इच्छा । अपनी परम्परा , अपना समाज उनके हाथो से छूटते जा रहा है । वे क्या पढ़ा रहे है इसका कोई मौलिक तर्क नही है उनके पास । वे पढ़ा रहे है क्योंकि सब पढ़ा रहे है । वे सीखा रहे है क्योंकि सब सिखा रहे है । वे ये नही जानते की संस्कार कैसे विकसित किये जाते है । लेकिन आज के चमक-दमक के सामने खुद को फिसड्डी पाने वाले आज की रफ़्तार के मुकाबले खुद को सुस्त पाने वाले शिक्षक में परिणत हुए माता - पिता अपनी सारी कुंठा और हताशा छात्रो में उठेल दें रहें हैं ।
               भविष्य की पाठ पढ़ाने वाली इन दिग्भर्मित पाठशालाओं का विस्तार अनन्त है ।10×10 कमरे से लेकर दसिओं एकड़ में फैले राजनीवासो की तरह ।कहीँ बैठने की टाट - पट्टी तक नही तो कहीँ वातानुकूलित पूर्व विकसित कम्प्यूटर कक्ष बने है ।कहीँ लाला जी दूकान में बैठे बैठे स्कुल का भी काम देख लेते है ।और कहीँ अच्छी खासी बहस करती प्रबन्ध समिति है ।कहीँ स्कुल के हिसाब किताब विधायक जी के साढ़ू देख लेते है ।कहीँ नर्सरी के बच्चे को पीने का पानी तक नही ।कहीँ महीने में एक बार डाक्टरी जाँच अनिवार्य है ।कोई पैमाना नही कोई मानक नही लेकिन है सब पब्लिक स्कुल ही ।
      ये गारेंटी बेचते है , अलिखित , अनकही गारेंटी आपके बच्चे को ऐसा अंग्रेजीदां बनायेगे की आने वाले दिनों में कुछ भी हो जाय आपका बच्चा अफसर ही होगा ।ग्रूमड टू इन ऑफिसर । अंग्रेजी बोलता विदेशी साहबो की तरह यहां परम्पराओं से अनभिज्ञ , वाकी दुनिया को हिकारत से देखते हुए , अपने लिये सुख साधन जुटा सकने में निर्पूण , हाय , थैंक्स और माई फुट से सज्जित । आखिर और क्या चाहिये आपको ! जीवन की लड़ाई में कन्धे झुकाये बाप और नास्ते में सैंडविच बनाती माँ को इसे बेहतर गारेंटी और क्या चाहिये । ये गारेंटी चाहे स्कुल की प्रॉस्पेक्ट्स में लिखी हुई न हो पर चमकदार कागज पर हुई छपाई में है ।इतनी भब्य है की इसकी चकाचौध में अपने बच्चों को एडमिशन कराकर आह्लादित हो जाते है ।पलट कर कोई नही पूछता कि भाई ये जो ताम झाम फैला रही है वो किस लिये है ?
       दाखिले के समय सारी पब्लिक स्कूले बड़ी बड़ी रकम लेकर अपना प्रॉस्पेक्ट्स बेचते है ।उनमे स्कुलो की इमारत से लेकर जिम्नेजियम तक की जानकारियां होती है ।जिलाधिकारी के साथ बैठक से लेकर , गणतन्त्र की परेड की झांकिया तक होती है ।लीं कोई स्कुल ये नही बताता की पढ़ाने वाले कौन है ? किस अतिरिक्त योग्यता के कारण आपके स्कुल के शिक्षक से श्रेष्ट है ! बताये कैसे ? बताने लायक हो तब न बताये । योग्यता वही जो सरकारी विधालयो में होती है ।तनख्वाह कम हो तो साल दो साल में छोड़ कर दूसरे स्कुल में चल दे , तो यह अतिरिक्त योग्यता हुई ।हां अंग्रेजी चासनी में जरूर सराबोर होना चाहिये ।इसिलिय तो बालकटि मैडम और टाई धारी टीचर का चलन ज्यादा है ।देश में कोई ऐसा पब्लिक स्कुल नही है जहां प्रबन्ध और बाल मनोविज्ञान पर शोध होता हो । जहां भविष्य के आकलन और समूह संचार प्रविधियां पर बहस होती हो ।जहां अच्छे टीचर की तलास की जाती हो ।और प्राथमिकता इसकी हो की पाठ कौन अच्छी तरह से पढ़ा सकता है ।चाहें तनख्वाह उचित ही क्यों न देनी पड़े ।लेकिन अपनी फ़ीस की रकम निर्धारित करने में विधालय स्वतन्त्र है ।शिक्षक की योग्यता के हिसाब से भले पैसा दे न दे पर बच्चों से तीन सौ के बदले पांच सौ , पांच सौ के बदले एक हजार वसूल कर सकते है ।क्योंकि वे दुसरो से अपने आपको श्रेष्ट दिखाना चाहते है ।क्योंकि इनके स्कुल में इनका अपना थियेटर है , अपनी प्रोजेक्टर है ,अपनी अस्तबल है ।
                  शिक्षक का स्तर वही है जो सरकारी विधालयो के शिक्षक की है । विषय वही है जो सरकार तय करती है ।शोध और अनुशांधान का जिम्मा सरकार की है । अंतर है तो सरकारी विधालयो की तरह वहां शिक्षिकाएं बैठकर स्वेटर नही बुनती और शिक्षक हाजिर लगाकर खेत में पटौनि करने नही जाते ।
      वे इसलिये अलग है क्योंकि किताबे अलग है क्योंकि उसमे दुकानदारी है , परिधान अलग है क्योंकि उसे बेच कर कमाई की जाती है । भारी वास्ता , होमवर्क डायरी है इतना कुछ देखकर लगता है कि इतना कुछ है तो कुछ कर ही रहे होंगे ।बच्चे पर जितना वजन लदा रहता है उतना ही अभिभावक प्रसन्न रहते है । क्या गजब की पढ़ाई करा रहे है ।अभिभावक पर जितना भार पड़ता है वे उतने ही सन्तुष्ट दीखते है ।बड़ा ही स्ट्रिक्ट है भाई । क्या गजब का स्कुल है ।
                 भविष्य के पौधे बनाने वाले , आदर्श शिक्षा की गारेंटी देने वाले आधुनिक दुकानदार , सेवा की रामनवमी चादर ओढ़े , पब्लिक स्कुल उनको ये भी पता नही की वे क्या पढ़ा रहे है ? भूगोल क्यों पढ़ा रहे है ? क्योंकि माध्यमिक बोर्ड में है । परीक्षा के बाद इस विषय से क्या लाभ होगा ? इनको पता नही ।कोई विधालय पर्तदार चट्टान वाली मिटटी दिखाने नही लेजातें ।क्लास में बैठे -बैठे एक के बदले दो दो के बदले चार किताबे पढ़ा देंगे।क्योंकि किताबो से कमाई होती है ।विधालयो के द्वारा ही किताबे एवं स्टेशनरी बेचे जाते है ।खुद विधायलय ही पहले यूनिफार्म तय करेगा फिर विधालय ही यूनिफार्म बेचेगा ।यूनिफार्म बेचने से मुनाफा मिलेगा अलग और नही पहन कर जाने वाले बच्चों से हर्जाना मिलेगा ।इसके अलावा दंड क्योंकि स्कुल स्ट्रिक्ट है जो । आखिर पैसा कमाने के लिये कौन स्ट्रिक्ट नही होगा ।कम्पनी सिक्रेटरी , डाक्टर , एमबीए , का सपना देखने वाले पर्तदार चट्टान के बारे में जान कर क्या करेंगे ।पता नही क्यों इन्हें शहर की बनावट , शहर से गन्दे पानी की निकासी के बारे में जानकारी क्यों नही दी जाती । नही क्योंकि कोर्स में नही है ।किसी विधालय में इतनी साहस नही की बोर्ड के इम्तहान से बाहर निकल कर शिक्षा के क्षेत्र में अपनी चातुरी दिखाए ।हम वही पढ़ाएंगे जिनकी जीवन में जरूरी है ।यह साहस कोई नही करता ।लेकिन इन सब मामलो में इनके पास अदभुत तर्क है । जैसे कम्प्यूटर सिखाते है तो तर्क आने वाले दिनों के लिये उन्हें तैयार कर रहे है ।नही सीखा रहे है तो तर्क इतनी कम उम्र में यह बोझ डालना ठीक नही । बच्चे आपस में लड़ जाय तो तर्क हम एक साथ जीने और सम्भंधो को निर्धारित करने का अवसर देते है ।लड़ने पर शिक्षक पिटाई कर दे तो तर्क हम अनुशासनहिंता की इजाजत नही देते ।हर काम का उनके पास तय सूदा कारण है ।जिसे गलत दिखे वो खुद गलत ।बच्चों को पढ़ाना है तो चुप रहने में ही भलाई है ।
             इन स्कुलो को आप मामूली न समझे । ये सबसे पहले बच्चों के माध्यम से सत्ता तक अपनी पैठ बनाते है । किसी के स्कुल में सचिव का बच्चा है तो किसी के स्कुल में सांसद के तो किसी के जिलाधिकारी के तो किसी के स्कुल में मुखिया जी के बच्चे पढ़ते है । जिस स्कुल में जितना प्रभावशाली बाप के बच्चे पढ़ते है वह स्कुल उतना ही महान । जिस स्कुल के सामने जितनी गाड़िया लगती है वह स्कुल उतना ही महान , आलीशान ।
               एक स्कुल है हरिद्वार में वह बच्चों की नाट्य क्षमता विकसित करने के लिये रामायण का मंचन करता है ।और सीता की भूमिका में देख कर बच्चे गाते है तू चीज बड़ी है मस्त मस्त ।एक स्कुल दिल्ली में है जहाँ 10वी , 12वी की क्षत्राओ को सेनेटरी टॉवेल मुफ़्त में दी जाती है , एक बार आजमाकर देखो ।कम्पनी उत्पाद से पढ़ाई का क्या सम्बन्ध ।राम सीता को देख कर मस्त मस्त क्यों गाता है यह पढ़ाई नही पश्चिमी सभ्यता की भड़उति है ।इसी तरह अगर यूरोप में मजाक उड़ाया जाता तो उसके औकात का पता चल जाता ।या लन्दन के किसी स्कुल में नैपकिन बाटा जाता तो स्कुल रसातल में चला जाता । लिकिन मामला हिंदुस्तान की है । पब्लिक स्कुलो की ऐसी मानसिकता इसलिये फल फूल रहा है की यहां के रिवाज , यहां की संस्कृति , यहां के लोग गुलाम है , घटिया है , ओछे है ।
                  कोई भी पब्लिक स्कुल अपने क्षत्रों से हिन्दुस्तान के गावों के बारे में नही बताते , वे क्षत्रों को मारुती और मर्सडीज के बारे में बताते । नीम के पत्ते और तुलसी के पत्तो से क्या फायदे है कोई नही बताता ।एक सर्वे के मुताबिक़ पब्लिक स्कुल के क्षात्रों को राष्ट्रीय गान , राष्ट्रीय पंक्षी जैसे तथ्यों की जानकारी नही होती ।वे जीवन को सेवा सम्बंधो की दृष्ट्री से नही देखते ।वे पेशे और कमाई के सन्दर्भों में सोचते है ।सरकारी स्कुलो के बच्चे आज भी यह कहते हुये मिलेंगे कि वे सेना में देश की रक्षा के लिए जायेंगे ।पब्लिक स्कुलो में यूज एन्ड थ्रो की ज्ञान पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है ।
             एक स्कुल में खास रंग के जूते नही पहनने के कारण बच्चों को प्रताड़ित करता है । वन्दना की गीत गाने या गलियारे में अपनी मातृ भाषा में बाते करने पर पिटाई करते है ।हम धर्म और क्षेत्र की कट्टरता के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे है ।और यहां जूते के रंग और भाषा का भेद भाव के रुप में अनुशासन सिखाया जाता है ।
            इसका अर्थ यह नही की सरकारी स्कूले बहुत ही अच्छे है । वहां गैर जिम्मेदारी की आलम यह है कि बच्चा स्कुल जाने की अपेक्षा अपने पिता की दूकान पर बैठ कर ज्यादा सिखलेता है । सरकारी स्कुलो की हाल अच्छी होती तो इस कदर पब्लिक स्कुलो की बाढ़ नही आती ।कूड़ा जब तक सड़ता नही तब तक उस पर कुकुर्मुते नही उगते । स्कुल पब्लिक हो या सरकारी वहां दी जाने वाली शिक्षा निरर्थक हो गई है ।शिक्षा देने की पद्धति बेकार हो गई है और शिक्षा देंने वाले चूक गए है । भौतिक के टीचर हिंदी गलत लिखते है इतिहास का टीचर अंग्रेजी गलत सीखा रहा है । पर स्कुल क्षात्रों से अपेक्षा रखता है की बच्चा भौतिक भी जाने , रसायन भी , हिंदी भी , अंग्रेजी भी जाने , संगीत भी जाने ।क्योंकि बोर्ड का इम्तहान जो देना है । पर मास्टर साहब के लिए जरूरी नही है क्योंकि वे संसारिक बन्धनो से मुक्त है ।
                   अभिभावक कुछ नही समझते एसी बात नही । पर वे लाचार है । कोई दूसरा विकल्प नही । वही हाल है लगभग पब्लिक स्कूलों एवं सरकारी स्कुलो की ।इसका जो छवि बन रही है वो इसे भी ज्यादा खतरनाक है ।
             लेकिन पुरे शिक्षातंत्र पर एक ही किस्म का आरोप नही लगाया जा सकता । कुछ सरकारी स्कूले भी अच्छी है , तो कुछ पब्लिक स्कुल भी ।वहां सदशिक्षा काम कर रही है । लेकिन उनकी संख्या बहुत ही कम है । इसलिये शिक्षा में बड़े पैमाने पर परिवर्तन की आवश्यकता है आखिर जमीन और जिंदगी से कटी हुई शिक्षा का क्या फायदा है ?
       




मंगलवार, 19 जनवरी 2016

यहां जिंदगी के पर्दे में मौत पलती है

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खुदा हमको बतादो यह कैसी बस्ती है



खुदा हमको बतादो यह कैसी बस्ती है ,
यहां जिंदगी के पर्दे में मौत पलती है ,
किसी के पावं तो पडतें है फर्श मखमखल पर ,
किसीकी लाश कफ़न के लिये तरसती है ,
मेरे पड़ोस की जालिम ने लूट ली अस्मत ,
कोई जवां लड़की कहती है और जलती है ,
यह कौन लोग है गर्दन को काट के कहते है ,
मस्ती - मस्ती है ....
इंसानियत के घर को गिराते है और कहते हैं ,
आवाज बुलन्द करो खुदा की यह बस्ती है ,
न इनको खौफ -ऐ -खुदा है और न आदमी का ख्याल ,
यह कैसा धर्म है जहां इंसानियत सिसकती है ,
जवां गुंचों को कुचलो ,कली मसल डालो ,
यहां पर जिंदगी महंगी है मौत सस्ती है ,
खुदा हमको बतादो यह कैसी बस्ती है ।


गुंडे के चंगुल से (ब्यंग )

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गुंडे के चंगुल से ( ब्यंग )




गुंडे के चंगुल से
लड़की को बचाते हुए
पुलिस वाला चिल्लाया
हराम..साले
हमारे होते हुए
किसकी हिम्मत की लड़की पर हाथ डाले ।

ब्यंग

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          ब्यंग 



एक पुलिसकर्मी बलत्कार के

आरोप में पकड़ा गया

बेचारा जल्दीबाजी में रगड़ा गया

पेशी में अफसर ने उसे कहा

बावले तूने तो पुरे महकमे का

नाम मिट्टी में मिला दिया

एक तो पुलिसकर्मी , दूसरे बलत्कार , तीसरे रंगे हाथो पकड़ा गया

पुलिसकर्मी घिघियाया

हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाया

हजुर माफ़ करो

मेरे अपराधो को साफ़ करो

मैं यह गलती कभी न दोहराऊंगा

इस बार छोड़ दे तो

आगे से कभी न पकड़ा जाऊंगा ।

देर आये दुरुस्त आये (ब्यंग)

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देर आये दुरुस्त आये( ब्यंग )



देर आये

दुरुस्त आये

वाली कहावत

पुलिस बखूबी निभाती है

जुर्म पहले होता है

पुलिस बाद में आती है ।