शुक्रवार, 11 मार्च 2016

पब्लिक स्कुल

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                              पब्लिक स्कुल




    ये भविष्य का पाठ पढ़ा रहे है हमारे बच्चों को , अपने विधार्थी को ,पूरी की पूरी नई पीढ़ी को ।ऐसा पाठ जो जिंदगी में घिसिट- घिसिट कर जिना न पड़े ।सुविधाओं के लिये दुसरो का मोहताज नही होना पड़े ।जमाना चाहे चोली के पीछे झांकने का हो या कम्प्यूटर विजार्ड का, वह कदमो में हो ।आदमियत हो न हो पर कामयाबी मुठ्ठी में हो ।जो खूबसूरत दिखे उसे हासिल करो और रस की बून्द चूसो और पैरो की ठोकर से दूर करो ।बिहेब योर सेल्फ माँम ।माइंड योर बिजनेस डैड ।हर तरह के हथियारो से लैस , चतुर चौकन्नी पीढ़ी ।आने वाले युग के लिये बख्तरबंद ।चीज बड़ी है मस्त - मस्त नानसेंस वाव् ।


           

                          ये पब्लिक स्कुल है ।गलियों में , मोहल्लों में , राजधानी के संभ्रांत इलाको से लेकर गावों एवं आदिवासी इलाको तक कुकुरमूते की तरह उगे हुए है । दो कमरो के मकान से लेकर नगर निगम के पार्क तक में जहां जगह मिले ।पब्लिक स्कुलो का नामकरण किड गार्डेन , मोंन्टेन्सरी , किड्स होम किसी भी ईसाई सन्त के नाम से लेकर माता जी के नाम पर कर सकते है ।नेता , अभिनेता , औधोगिक घरानो , इतिहासिक पुरुषो , और शब्दकोशों से चुन कर किसी जटिल संस्कृत निष्ट नाम वाले नाम । काल्पनिक अंग्रेजी नाम पर आधारित और कुछ न हो तो लन्दन के जुआ घर के नाम पर ही । यहां जानता कौन है ? सारे पब्लिक स्कुल आधुनिक शिक्षा पद्धति के स्वघोषित अग्रदूत । सब के सब लगे हुये है आने वाली पीढ़ी को दक्ष बनाने में ।


       

                   लेकिन वे स्वयं दिग्भर्मित है । शिक्षा के क्षेत्र में चल रहे आधुनिक प्रयोग की उन्हें जानकारी नही है । न इतने संसाधन है , न जानने की इच्छा । अपनी परम्परा , अपना समाज उनके हाथो से छूटते जा रहा है । वे क्या पढ़ा रहे है इसका कोई मौलिक तर्क नही है उनके पास । वे पढ़ा रहे है क्योंकि सब पढ़ा रहे है । वे सीखा रहे है क्योंकि सब सिखा रहे है । वे ये नही जानते की संस्कार कैसे विकसित किये जाते है । लेकिन आज के चमक-दमक के सामने खुद को फिसड्डी पाने वाले आज की रफ़्तार के मुकाबले खुद को सुस्त पाने वाले शिक्षक में परिणत हुए माता - पिता अपनी सारी कुंठा और हताशा छात्रो में उठेल दें रहें हैं ।


             

                     भविष्य की पाठ पढ़ाने वाली इन दिग्भर्मित पाठशालाओं का विस्तार अनन्त है ।10×10 कमरे से लेकर दसिओं एकड़ में फैले राजनीवासो की तरह ।कहीँ बैठने की टाट - पट्टी तक नही तो कहीँ वातानुकूलित पूर्व विकसित कम्प्यूटर कक्ष बने है ।कहीँ लाला जी दूकान में बैठे बैठे स्कुल का भी काम देख लेते है ।और कहीँ अच्छी खासी बहस करती प्रबन्ध समिति है ।कहीँ स्कुल के हिसाब किताब विधायक जी के साढ़ू देख लेते है ।कहीँ नर्सरी के बच्चे को पीने का पानी तक नही ।कहीँ महीने में एक बार डाक्टरी जाँच अनिवार्य है ।कोई पैमाना नही कोई मानक नही लेकिन है सब पब्लिक स्कुल ही ।


   

                         ये गारेंटी बेचते है , अलिखित , अनकही गारेंटी आपके बच्चे को ऐसा अंग्रेजीदां बनायेगे की आने वाले दिनों में कुछ भी हो जाय आपका बच्चा अफसर ही होगा ।ग्रूमड टू इन ऑफिसर । अंग्रेजी बोलता विदेशी साहबो की तरह यहां परम्पराओं से अनभिज्ञ , वाकी दुनिया को हिकारत से देखते हुए , अपने लिये सुख साधन जुटा सकने में निर्पूण , हाय , थैंक्स और माई फुट से सज्जित । आखिर और क्या चाहिये आपको ! जीवन की लड़ाई में कन्धे झुकाये बाप और नास्ते में सैंडविच बनाती माँ को इसे बेहतर गारेंटी और क्या चाहिये । ये गारेंटी चाहे स्कुल की प्रॉस्पेक्ट्स में लिखी हुई न हो पर चमकदार कागज पर हुई छपाई में है ।इतनी भब्य है की इसकी चकाचौध में अपने बच्चों को एडमिशन कराकर आह्लादित हो जाते है ।पलट कर कोई नही पूछता कि भाई ये जो ताम झाम फैला रही है वो किस लिये है ?


     

                           दाखिले के समय सारी पब्लिक स्कूले बड़ी बड़ी रकम लेकर अपना प्रॉस्पेक्ट्स बेचते है ।उनमे स्कुलो की इमारत से लेकर जिम्नेजियम तक की जानकारियां होती है ।जिलाधिकारी के साथ बैठक से लेकर , गणतन्त्र की परेड की झांकिया तक होती है ।लीं कोई स्कुल ये नही बताता की पढ़ाने वाले कौन है ? किस अतिरिक्त योग्यता के कारण आपके स्कुल के शिक्षक से श्रेष्ट है ! बताये कैसे ? बताने लायक हो तब न बताये । योग्यता वही जो सरकारी विधालयो में होती है ।तनख्वाह कम हो तो साल दो साल में छोड़ कर दूसरे स्कुल में चल दे , तो यह अतिरिक्त योग्यता हुई ।हां अंग्रेजी चासनी में जरूर सराबोर होना चाहिये ।इसिलिय तो बालकटि मैडम और टाई धारी टीचर का चलन ज्यादा है ।देश में कोई ऐसा पब्लिक स्कुल नही है जहां प्रबन्ध और बाल मनोविज्ञान पर शोध होता हो । जहां भविष्य के आकलन और समूह संचार प्रविधियां पर बहस होती हो ।जहां अच्छे टीचर की तलास की जाती हो ।और प्राथमिकता इसकी हो की पाठ कौन अच्छी तरह से पढ़ा सकता है ।चाहें तनख्वाह उचित ही क्यों न देनी पड़े ।लेकिन अपनी फ़ीस की रकम निर्धारित करने में विधालय स्वतन्त्र है ।शिक्षक की योग्यता के हिसाब से भले पैसा दे न दे पर बच्चों से तीन सौ के बदले पांच सौ , पांच सौ के बदले एक हजार वसूल कर सकते है ।क्योंकि वे दुसरो से अपने आपको श्रेष्ट दिखाना चाहते है ।क्योंकि इनके स्कुल में इनका अपना थियेटर है , अपनी प्रोजेक्टर है ,अपनी अस्तबल है ।

                 शिक्षक का स्तर वही है जो सरकारी विधालयो के शिक्षक की है । विषय वही है जो सरकार तय करती है ।शोध और अनुशांधान का जिम्मा सरकार की है । अंतर है तो सरकारी विधालयो की तरह वहां शिक्षिकाएं बैठकर स्वेटर नही बुनती और शिक्षक हाजिर लगाकर खेत में पटौनि करने नही जाते ।      वे इसलिये अलग है क्योंकि किताबे अलग है क्योंकि उसमे दुकानदारी है , परिधान अलग है क्योंकि उसे बेच कर कमाई की जाती है । भारी वास्ता , होमवर्क डायरी है इतना कुछ देखकर लगता है कि इतना कुछ है तो कुछ कर ही रहे होंगे ।बच्चे पर जितना वजन लदा रहता है उतना ही अभिभावक प्रसन्न रहते है । क्या गजब की पढ़ाई करा रहे है ।अभिभावक पर जितना भार पड़ता है वे उतने ही सन्तुष्ट दीखते है ।बड़ा ही स्ट्रिक्ट है भाई । क्या गजब का स्कुल है ।                 

                    भविष्य के पौधे बनाने वाले , आदर्श शिक्षा की गारेंटी देने वाले आधुनिक दुकानदार , सेवा की रामनवमी चादर ओढ़े , पब्लिक स्कुल उनको ये भी पता नही की वे क्या पढ़ा रहे है ? भूगोल क्यों पढ़ा रहे है ? क्योंकि माध्यमिक बोर्ड में है । परीक्षा के बाद इस विषय से क्या लाभ होगा ? इनको पता नही ।कोई विधालय पर्तदार चट्टान वाली मिटटी दिखाने नही लेजातें ।क्लास में बैठे -बैठे एक के बदले दो दो के बदले चार किताबे पढ़ा देंगे।क्योंकि किताबो से कमाई होती है ।विधालयो के द्वारा ही किताबे एवं स्टेशनरी बेचे जाते है ।खुद विधायलय ही पहले यूनिफार्म तय करेगा फिर विधालय ही यूनिफार्म बेचेगा ।यूनिफार्म बेचने से मुनाफा मिलेगा अलग और नही पहन कर जाने वाले बच्चों से हर्जाना मिलेगा ।इसके अलावा दंड क्योंकि स्कुल स्ट्रिक्ट है जो । आखिर पैसा कमाने के लिये कौन स्ट्रिक्ट नही होगा ।कम्पनी सिक्रेटरी , डाक्टर , एमबीए , का सपना देखने वाले पर्तदार चट्टान के बारे में जान कर क्या करेंगे ।पता नही क्यों इन्हें शहर की बनावट , शहर से गन्दे पानी की निकासी के बारे में जानकारी क्यों नही दी जाती । नही क्योंकि कोर्स में नही है ।किसी विधालय में इतनी साहस नही की बोर्ड के इम्तहान से बाहर निकल कर शिक्षा के क्षेत्र में अपनी चातुरी दिखाए ।हम वही पढ़ाएंगे जिनकी जीवन में जरूरी है ।यह साहस कोई नही करता ।लेकिन इन सब मामलो में इनके पास अदभुत तर्क है । जैसे कम्प्यूटर सिखाते है तो तर्क आने वाले दिनों के लिये उन्हें तैयार कर रहे है ।नही सीखा रहे है तो तर्क इतनी कम उम्र में यह बोझ डालना ठीक नही । बच्चे आपस में लड़ जाय तो तर्क हम एक साथ जीने और सम्भंधो को निर्धारित करने का अवसर देते है ।लड़ने पर शिक्षक पिटाई कर दे तो तर्क हम अनुशासनहिंता की इजाजत नही देते ।हर काम का उनके पास तय सूदा कारण है ।जिसे गलत दिखे वो खुद गलत ।बच्चों को पढ़ाना है तो चुप रहने में ही भलाई है ।  इन स्कुलो को आप मामूली न समझे । ये सबसे पहले बच्चों के माध्यम से सत्ता तक अपनी पैठ बनाते है । किसी के स्कुल में सचिव का बच्चा है तो किसी के स्कुल में सांसद के तो किसी के जिलाधिकारी के तो किसी के स्कुल में मुखिया जी के बच्चे पढ़ते है । जिस स्कुल में जितना प्रभावशाली बाप के बच्चे पढ़ते है वह स्कुल उतना ही महान । जिस स्कुल के सामने जितनी गाड़िया लगती है वह स्कुल उतना ही महान , आलीशान ।               


                  एक स्कुल है हरिद्वार में वह बच्चों की नाट्य क्षमता विकसित करने के लिये रामायण का मंचन करता है ।और सीता की भूमिका में देख कर बच्चे गाते है तू चीज बड़ी है मस्त मस्त ।एक स्कुल दिल्ली में है जहाँ 10वी , 12वी की क्षत्राओ को सेनेटरी टॉवेल मुफ़्त में दी जाती है , एक बार आजमाकर देखो ।कम्पनी उत्पाद से पढ़ाई का क्या सम्बन्ध ।राम सीता को देख कर मस्त मस्त क्यों गाता है यह पढ़ाई नही पश्चिमी सभ्यता की भड़उति है ।इसी तरह अगर यूरोप में मजाक उड़ाया जाता तो उसके औकात का पता चल जाता ।या लन्दन के किसी स्कुल में नैपकिन बाटा जाता तो स्कुल रसातल में चला जाता । लिकिन मामला हिंदुस्तान की है । पब्लिक स्कुलो की ऐसी मानसिकता इसलिये फल फूल रहा है की यहां के रिवाज , यहां की संस्कृति , यहां के लोग गुलाम है , घटिया है , ओछे है ।                  

            

                       कोई भी पब्लिक स्कुल अपने क्षत्रों से हिन्दुस्तान के गावों के बारे में नही बताते , वे क्षत्रों को मारुती और मर्सडीज के बारे में बताते । नीम के पत्ते और तुलसी के पत्तो से क्या फायदे है कोई नही बताता ।एक सर्वे के मुताबिक़ पब्लिक स्कुल के क्षात्रों को राष्ट्रीय गान , राष्ट्रीय पंक्षी जैसे तथ्यों की जानकारी नही होती ।वे जीवन को सेवा सम्बंधो की दृष्ट्री से नही देखते ।वे पेशे और कमाई के सन्दर्भों में सोचते है ।सरकारी स्कुलो के बच्चे आज भी यह कहते हुये मिलेंगे कि वे सेना में देश की रक्षा के लिए जायेंगे ।पब्लिक स्कुलो में यूज एन्ड थ्रो की ज्ञान पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है ।             एक स्कुल में खास रंग के जूते नही पहनने के कारण बच्चों को प्रताड़ित करता है । वन्दना की गीत गाने या गलियारे में अपनी मातृ भाषा में बाते करने पर पिटाई करते है ।हम धर्म और क्षेत्र की कट्टरता के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे है ।और यहां जूते के रंग और भाषा का भेद भाव के रुप में अनुशासन सिखाया जाता है ।            इसका अर्थ यह नही की सरकारी स्कूले बहुत ही अच्छे है । वहां गैर जिम्मेदारी की आलम यह है कि बच्चा स्कुल जाने की अपेक्षा अपने पिता की दूकान पर बैठ कर ज्यादा सिखलेता है । सरकारी स्कुलो की हाल अच्छी होती तो इस कदर पब्लिक स्कुलो की बाढ़ नही आती ।कूड़ा जब तक सड़ता नही तब तक उस पर कुकुर्मुते नही उगते । स्कुल पब्लिक हो या सरकारी वहां दी जाने वाली शिक्षा निरर्थक हो गई है ।शिक्षा देने की पद्धति बेकार हो गई है और शिक्षा देंने वाले चूक गए है । भौतिक के टीचर हिंदी गलत लिखते है इतिहास का टीचर अंग्रेजी गलत सीखा रहा है । पर स्कुल क्षात्रों से अपेक्षा रखता है की बच्चा भौतिक भी जाने , रसायन भी , हिंदी भी , अंग्रेजी भी जाने , संगीत भी जाने ।क्योंकि बोर्ड का इम्तहान जो देना है । पर मास्टर साहब के लिए जरूरी नही है क्योंकि वे संसारिक बन्धनो से मुक्त है ।                   

    

                     अभिभावक कुछ नही समझते एसी बात नही । पर वे लाचार है । कोई दूसरा विकल्प नही । वही हाल है लगभग पब्लिक स्कूलों एवं सरकारी स्कुलो की ।इसका जो छवि बन रही है वो इसे भी ज्यादा खतरनाक है ।लेकिन पुरे शिक्षातंत्र पर एक ही किस्म का आरोप नही लगाया जा सकता । कुछ सरकारी स्कूले भी अच्छी है , तो कुछ पब्लिक स्कुल भी ।वहां सदशिक्षा काम कर रही है । लेकिन उनकी संख्या बहुत ही कम है । इसलिये शिक्षा में बड़े पैमाने पर परिवर्तन की आवश्यकता है आखिर जमीन और जिंदगी से कटी हुई शिक्षा का क्या फायदा है ?


       



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